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सच की तह तक

कोरबा: हरे जंगलों से खदानों तक – आदिमानव की विरासत और ऊर्जा नगरी का संघर्ष

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संपादकीय By ACGN 7647981711, 9303948009

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक

✍️ कलम की धार ✍️

जहाँ कलम सवाल पूछती है और सच सामने आता है…

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक “कलम की धार” जनहित, सत्य और सामाजिक सरोकारों की वह निर्भीक आवाज़ है, जो सत्ता के गलियारों से नहीं, बल्कि आम जनता के बीच से उठती है। यह मंच उन मुद्दों को सामने लाता है, जिन पर अक्सर चुप्पी थोप दी जाती है और उन सवालों को उठाता है जिनका जवाब समाज जानना चाहता है। कलम की धार में शामिल हैं, जनहित से जुड़े जमीनी मुद्दे, भ्रष्टाचार का बेबाक और तथ्यपरक विश्लेषण, राजनीति की चमक के पीछे की सच्ची तस्वीर, लोक पर्व, परंपरा, संस्कार और संस्कृति की पहचान, अपने क्षेत्र के पर्यटन स्थल और अनकही कहानियाँ, प्राचीन धरोहरों और विरासत पर आलोचनात्मक दृष्टि यह मंच उन लोगों के लिए है, जो सिर्फ देखना नहीं, लिखना चाहते हैं, जो चुप रहना नहीं, सवाल पूछना चाहते हैं और जो चाहते हैं कि उनके गांव, शहर और समाज की बात पूरे देश – प्रदेश तक पहुँचे। अगर आपके मन में कोई विचार है कोई सवाल है कोई पीड़ा है या अपने क्षेत्र की कोई सच्ची कहानी है तो कलम की धार आपके लिए खुला मंच है। आपकी कलम, समाज की ताकत बने! आपकी आवाज़, बदलाव की शुरुआत बने, अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का कलम की धार सच लिखने का साहस… हर सप्ताह रविवार को   अपने लेख, विचार या रिपोर्ट व्हाट्सएप करें 7647981711, 9303948009 पर आज का विषय–  कोरबा का इतिहास और वर्तमान – आदिमानव से ऊर्जा नगरी तक, क्या विकास के इस रास्ते पर कोरबा अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर खो देगा आलेख – प्रदीप मिश्रा छत्तीसगढ़ का कोरबा नाम ही जैसे मध्य भारत की धरती की कहानी कह रहा हो। यहां के हरे-भरे जंगल, पहाड़, कल-कल करती नदियाँ और झरने आज भी उस समय की याद दिलाते हैं जब मानव ने पहली बार इस क्षेत्र में कदम रखा। आदिमानवों के जीवन से लेकर आज की ऊर्जा नगरी तक, कोरबा का इतिहास एक जीवंत यात्रा है। यह यात्रा केवल औद्योगिक शहर के भ्रमण तक सीमित नहीं है बल्कि हमें सोचने पर मजबूर करती है कि वर्तमान में तेजी से बढ़ती आधुनिकता और विकास के इस रास्ते पर कहीं हम अपनी प्राकृतिक विरासत और सांस्कृतिक धरोहर को खो तो नहीं देंगे।

आदिमानव और प्राचीन कोरबा

कोरबा की भूमि सदियों से मानव जीवन का केंद्र रही है। कोरबा की जीवन दायिनी हसदेव और यहां बहने वाली अन्य नदियों और पहाड़ों की घाटियों में आज भी प्राचीन काल में आदिमानवों के रहने के प्रमाण मिलते हैं। मुख्यालय से कुछ दूर वनांचल क्षेत्र में स्थित ग्राम दुधीटांगर और आसपास की गुफाओं में शैलचित्र और पत्थर के औजार और कंचन पहाड़, ज्वालेश्वर महादेव, पाली, तुमान स्थित प्राचीन शिव मंदिर, चैतुरगढ़ मंदिर कोसगई पहाड़ मंदिर के आस पास स्थित पुरातात्विक अवशेष,  आज भी यह बताते हैं कि हजारों साल पहले मानव यहाँ अपने जीवन यापन के लिए निवास करता था। कल्पना कीजिए – एक आदिमानव परिवार पहाड़ों और नदियों से घिरे इस क्षेत्र में अपने भोजन की तलाश में निकल रहा है, पत्थर और लकड़ी के उपकरणों से शिकार करता हुआ जंगल की उपज से जीवन यापन कर रहा है, उसकी पत्नी मिट्टी के बर्तन बना रही है और बच्चे शिकारी कौशल सीख रहे हैं, हसदेव नदी की कल-कल करती धारा, पहाड़ों की ठंडी हवा और घने जंगल उनके जीवन का अटूट हिस्सा थे। आज भी आदिवासी समुदाय कोरवा, बिरहोर और पंडो अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और रीति-रिवाजों के माध्यम से उस जीवनशैली की झलक देते हैं। जंगल, नदियाँ और पहाड़ उनकी पहचान हैं। और वनोपज उनकी जीवन यापन का साधन था, पर वर्तमान में तेजी से बढ़ती आधुनिकता  अब इन संस्कार और संस्कृतियों को समाप्त करती दिख रही है

वैदिक और मध्यकालीन महत्व

  कोरबा वैदिक काल में धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा। कोरबा रेलवे स्टेशन के समीप स्थित प्राचीन गुफा इन गुफाओं में से एक था गुफा में राम, सीता और लक्ष्मण की प्राचीन मूर्तियां हैं। ऐसा माना जाता है कि जब राम अपने वानवास समय के दौरान यहां रहते थे। दो पैर प्रिंट मिले हैं। लोगों का मानना था कि ये सीता के पैर हैं। एक प्राचीन पत्थर शिलालेख है जहां अष्टद्वार जिले के निवासी वेदपुत्र श्रीवर्धन का उल्लेख और ऋषभतीर्थ, दमऊ धारा, गुंजी, बाराद्वार और अष्टद्वार जैसे स्थल न केवल धार्मिक बल्कि प्रशासनिक गतिविधियों के केंद्र थे। इसे ऋषभतीर्थ इसलिए कहा जाता था क्योंकि माना जाता है कि यहां ऋषभ ऋषि और उनके शिष्यों का निवास था और यह स्थल तपस्या और शिक्षा का केंद्र था। 7वीं और 8वीं शताब्दी के शिलालेख इस बात के प्रमाण हैं कि उस समय कोरबा में सामाजिक और प्रशासनिक गतिविधियाँ सुव्यवस्थित थीं। मध्यकाल में जमींदारी प्रणाली का विकास हुआ। जोगीराय और अन्य स्थानीय शासकों ने कोरबा को प्रशासनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से व्यवस्थित किया। इस दौरान महल, मंदिर, किले और प्रशासनिक भवनों का निर्माण हुआ। कल्पना कीजिए – जमींदार अपने महल से बाहर निकलते हैं, गांव के लोग हाथ जोड़कर उनका अभिवादन करते हैं, बच्चे खेल रहे हैं, महिलाएं कला का प्रदर्शन कर रही हैं। यह दृश्य आज के औद्योगिक कोरबा से बिल्कुल अलग है, लेकिन इतिहास की यह झलक हमें याद दिलाती है कि यह धरती सदियों से मानव जीवन और सभ्यता की कहानी कहती रही है।

पुरातात्विक स्थल और संग्रहालय

  कोरबा के पुरातात्विक स्थल आज भी इसकी प्राचीनता और सांस्कृतिक महत्व का प्रमाण देते हैं। दुधीटांगर गुफा के प्राचीन शैलचित्र और मानवकृतियां, जो आज भी कोरबा पुरातत्व संग्रहालय में रखे आदिवासी औजार और जमींदारी काल के हथियार, कुदुरमाल और पाली,तुमान  ग्राम के मंदिर स्थापत्य कला और धार्मिक केंद्र, कोरबा शहर के रेलवे स्टेशन के समीप स्थित सीतामढ़ी गुफा  और अष्टद्वार के शिलालेख प्रशासनिक और धार्मिक प्रमाण । कुदुरमाल का मंदिर और समाधि स्थल और अन्य गुफाएं आदिमानव और मध्यकालीन जीवन के संकेत देती हैं। ये स्थल न केवल ऐतिहासिक महत्व रखते हैं बल्कि पर्यटन और शिक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

कोरबा की प्राचीन मंदिरों की छटा

कोरबा के मंदिर भी उसकी प्राचीनता का परिचायक हैं। पाली का प्राचीन शिव मंदिर, चैतुरगढ़ का प्राचीन महिषासुर मदिनी मंदिर, कोसगई मंदिर, सर्वमंगल मंदिर, मडवारानी मंदिर, सीतामढ़ी की राम गुफा इन सभी का स्थापत्य और धार्मिक महत्व अद्भुत है।कनकी और मड़वारानी मंदिर, पहाड़ी की चोटी पर स्थित धार्मिक स्थल, सर्वमंगला और मेहरगढ़ मंदिर, सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र, तुमान और पाली का प्राचीन शिव मंदिर और चैतुरगढ़ का मंदिर और मध्यकालीन किले और इतिहास, कोसगईगढ़ किला 9वीं-11वीं शताब्दी की स्थापत्य कला। प्रत्येक मंदिर अपने समय के स्थापत्य और संस्कृति को दर्शाता है। कल्पना कीजिए – पहाड़ी की चोटी पर स्थित मडवारानी मंदिर की ओर चढ़ते हुए घने जंगल और नीचे बहती नदियों की छटा, पवित्र शिवालय की घंटियों की आवाज़, और आसपास की शांतता, यह अनुभव किसी भी पर्यटक को मंत्रमुग्ध कर देता है।

खनिज संपदा और ऊर्जा नगरी का उदय

20वीं सदी में धीरे धीरे कोरबा की पहचान बदल गई। कोयला, लिथियम, बॉक्साइट और यूरेनियम की खोज ने इसे औद्योगिक केंद्र में बदल दिया। गेवरा, कुसमुंडा और दिपका खदानें आज भी देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती हैं। एनटीपीसी, सीएसईबी और अन्य ऊर्जा संयंत्रों ने कोरबा को ऊर्जा हब बना दिया। यह औद्योगिक क्रांति रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण पर दबाव भी डाल रही है। कल्पना कीजिए – सुबह सूरज की पहली किरणों में खदानों से उठती धूल और धुएँ के बीच मजदूर अपने काम पर जा रहे हैं, बच्चे स्कूल की ओर बढ़ रहे हैं, महिलाएं घर संभाल रही हैं, और खदानों की गहरी सुरंगों से कोयला बाहर निकल रहा है। यह आधुनिक कोरबा का जीवन है जहाँ औद्योगिक विकास और प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत मिश्रण है।

प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन स्थल

कोरबा केवल औद्योगिक नगरी नहीं है। यह क्षेत्र हरे-भरे वन, पहाड़, झरने, नदी-नाले और ऐतिहासिक स्थल प्रस्तुत करता है। देवपहरी जलप्रपात में कल-कल करती झरनों की प्राकृतिक छटा, रानी झरना, सतरेंगा, बुका, केंदई जलप्रपात,और भी अन्य पर्यटन स्थलों के वनों के शांत वातावरण में पानी की बूँदों की ताजगी,  हरे-भरे जंगलों में घूमते हुए आप हर कदम पर पक्षियों की चहचहाहट, नदियों का कल-कल बहना और पहाड़ों की ठंडी हवा महसूस कर सकते हैं।

हरी-भरी जंगलों की चिंता

हालांकि कोरबा के जंगल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक हैं, खनिज और ऊर्जा केंद्रों के विस्तार ने इन जंगलों को काटना शुरू कर दिया है। पहले जहां आदिवासी और वन्य जीव निर्बाध जीवन जीते थे, अब खदानों और ऊर्जा संयंत्रों से निकलने वाली धूल, सफेद राख और प्रदूषण से वनस्पतियों और पशुपक्षियों का जीवन संकट में है। हर दिन कटते पेड़, खोते वन्यजीव और खदानों से फैलती धूल यह सवाल खड़े करती है कि क्या कोरबा का प्राकृतिक सौंदर्य आने वाले वर्षों में इतिहास बन जाएगा।

विकास और पर्यावरणीय संकट

खनिज और ऊर्जा केंद्रों ने कोरबा में आर्थिक समृद्धि लाई है, लेकिन प्रदूषण और पर्यावरणीय संकट भी उत्पन्न हुआ है। बिजली संयंत्रों से निकलने वाला सफेद राख और कोयले की धूल, खदानों से निकलते और काले धुएँ, पेड़ और वनस्पतियों का कटाव, नदियों में प्रदूषण और प्राकृतिक सौंदर्य का नुकसान। इससे पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ रहा है। हवा और पानी प्रदूषित हो रहे हैं, जंगलों और पहाड़ों की हरी-भरी छटा धीरे-धीरे मिट रही है। प्रश्न खड़े होते हैं क्या विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों की इतनी क्षति उचित है, क्या आने वाले समय में कोरबा केवल खनिज और औद्योगिक नगरी के रूप में ही जाना जाएगा, या इसकी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत भी सुरक्षित रहेगी, क्या हम भविष्य में अपनी आने वाली पीढ़ियों को हरे-भरे वन, कल-कल करती नदियाँ और झरने दे पाएंगे या केवल खदानों और ऊर्जा संयंत्रों का धुंधला दृश्य देखेंगे।

आदिवासी अनुभव और सांस्कृतिक धरोहर

कोरबा की यात्रा में आदिवासी समुदाय का अनुभव अनिवार्य है। कोरवा आदिवासी जंगल और नदियों के साथ जीवन जीते हैं, मिट्टी और लकड़ी के उपकरणों का उपयोग करते हैं। पंडो और बिरहोर अपने पारंपरिक नृत्य, गीत और लोककथाओं के माध्यम से संस्कृति का प्रदर्शन करते हैं। स्थानीय भोजन जैसे जंगल के फल, जड़ी-बूटियाँ और मछली पर्यटक अनुभव को और भी जीवंत बनाते हैं। एक पर्यटक आदिवासियों के साथ एक दिन बिताता है उनकी जीवनशैली, गीत, कला और जंगल के संसाधनों के उपयोग को देखता है। यह अनुभव कोरबा की वास्तविक पहचान से परिचित कराता है।

भावनात्मक और समीक्षात्मक विश्लेषण

छत्तीसगढ़ का वन आच्छादित हरे भरे जंगलों पर्यटन स्थलों, प्राचीन धरोहरों और खनिज से भरपूर कोरबा जिला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण का संतुलन कितना महत्वपूर्ण है। औद्योगिक प्रगति और खनिज संपदा के बीच प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विरासत खोने का खतरा हमेशा बना रहता है।   कल्पना कीजिए—एक पर्यटक देवपहरी जलप्रपात पर खड़ा है, झरनों की ठंडी बूँदें चेहरे पर पड़ रही हैं, लेकिन नजदीकी खदानों से उठते धुएँ की छाया उसकी आँखों में सवाल पैदा कर रही है। क्या यह सुंदरता हमेशा बनी रहेगी, या आने वाले वर्षों में केवल इतिहास और किताबों तक सीमित हो जाएगी।   कोरबा का इतिहास आदिमानवों से लेकर आधुनिक ऊर्जा नगरी तक एक अद्भुत यात्रा है। यह क्षेत्र केवल खनिज संपदा और औद्योगिक शक्ति का केंद्र नहीं, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक स्थलों, पुरातात्विक स्थल और सांस्कृतिक विरासत का भी केंद्र है। लेकिन सवाल यह है, क्या हम इस विकास में इतनी आगे बढ़ गए हैं कि प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विरासत खतरे में पड़ जाए। यदि संतुलन न बनाया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल खदानों और ऊर्जा संयंत्रों का धुंधला दृश्य ही देख पाएंगी। कोरबा की यात्रा हमें अनुभव, आत्मविश्लेषण और निर्णय लेने के लिए प्रेरित करती है। यह याद दिलाती है कि विकास और संरक्षण का संतुलन ही स्थायी सफलता की कुंजी है। यदि समय रहते निर्णय लिया गया, तो कोरबा न केवल औद्योगिक केंद्र, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और मानव सभ्यता का जीवंत उदाहरण बन सकता है। हमारा कोरबा प्राकृतिक पर्यटन और पिकनिक स्थलों से भरा पूरा है इन स्थलों को सुनियोजित तरीके से विकसित करने पर बाहरी पर्यटक आने की संभावना बढ़ेगी। इन स्थलों पर ट्रेकिंग, कैम्पिंग आदि साहसिक कार्यक्रम भी आयोजित किये जा सकते हैं।

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