कटघोरा को जिला बनाने की मांग पर अधिवक्ता संघ आर-पार की लड़ाई के मूड में
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कोरबा छत्तीसगढ़
By ACGN 7647 9817119303 948009
30 जनवरी से न्यायालय परिसर के सामने अनिश्चितकालीन क्रमिक धरना
कोरबा/कटघोरा। कटघोरा को जिला बनाए जाने की वर्षों पुरानी और जनहित से जुड़ी मांग एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुँचती नजर आ रही है। शासन-प्रशासन की लंबी चुप्पी और लगातार टालमटोल से क्षुब्ध अधिवक्ता संघ कटघोरा ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। संघ ने स्पष्ट किया है कि 30 जनवरी 2026 से कटघोरा न्यायालय परिसर के सामने अनिश्चितकालीन क्रमिक धरना प्रदर्शन शुरू किया जाएगा।

अधिवक्ता संघ के पदाधिकारियों ने बताया कि कटघोरा क्षेत्र भौगोलिक स्थिति, प्रशासनिक आवश्यकता, जनसंख्या घनत्व एवं आर्थिक गतिविधियों की दृष्टि से जिला बनने के सभी मापदंडों को वर्षों पहले ही पूरा कर चुका है। इसके बावजूद जिला निर्माण की फाइलें आज भी सरकारी दफ्तरों में लंबित पड़ी हैं। इसका सीधा खामियाजा क्षेत्र की जनता को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्यों के लिए कोरबा सहित अन्य जिलों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
संघ का कहना है कि जिला न बनने से स्वास्थ्य, शिक्षा, राजस्व, पुलिस एवं न्यायिक सेवाओं पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कई विकास योजनाएं कागजों में सिमट कर रह गई हैं और क्षेत्र विकास की दौड़ में लगातार पिछड़ता जा रहा है। यह स्थिति अब किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।

अधिवक्ता संघ ने बताया कि पूर्व में कई बार शासन को ज्ञापन सौंपे गए, शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन किए गए और जनप्रतिनिधियों से संवाद भी स्थापित किया गया, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिले। अब संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक कटघोरा को जिला बनाए जाने पर ठोस और समयबद्ध निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
संघ ने इस आंदोलन को केवल अधिवक्ताओं का नहीं, बल्कि पूरे कटघोरा अंचल की जनभावनाओं से जुड़ा मुद्दा बताते हुए सभी सामाजिक संगठनों, व्यापारी संघों, किसान संगठनों, युवा मंचों, छात्र संगठनों एवं आम नागरिकों से बड़ी संख्या में आंदोलन में शामिल होने की अपील की है। साथ ही यह भी दोहराया गया कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और अनुशासित तरीके से संचालित किया जाएगा।
धरना प्रदर्शन की घोषणा के बाद कटघोरा सहित आसपास के क्षेत्रों में राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियाँ तेज हो गई हैं। जानकारों का मानना है कि यदि शासन ने शीघ्र ही इस मांग पर गंभीरता नहीं दिखाई, तो यह आंदोलन और अधिक व्यापक रूप ले सकता है।
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