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UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, कहा— ‘दुरुपयोग की आशंका, हम चिंतित’

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नई दिल्ली

By ACGN 7647 9817119303 948009


2012 के नियम फिलहाल लागू रहेंगे, अगली सुनवाई 19 मार्च को

नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि देश के सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा होना आवश्यक है और नए नियमों के दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस नए नियम को लेकर चिंतित है, इसलिए फिलहाल इस पर रोक लगाई जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में क्या-क्या अहम बातें सामने आईं

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यूजीसी के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि उन्होंने यूजीसी के नए नियमों के सेक्शन 3(सी) को चुनौती दी है। उनका कहना था कि रेगुलेशन में भेदभाव की जो परिभाषा दी गई है, वह संविधान के अनुरूप नहीं है, क्योंकि संविधान भेदभाव को सभी नागरिकों के संदर्भ में देखता है, जबकि नए नियम इसे केवल विशेष वर्ग तक सीमित कर देते हैं।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने एक उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि यदि दक्षिण भारत का कोई छात्र उत्तर भारत में या उत्तर का छात्र दक्षिण भारत में पढ़ाई के दौरान अपमानजनक टिप्पणी का शिकार होता है और जाति की जानकारी ही उपलब्ध नहीं है, तो ऐसी स्थिति में किस प्रावधान के तहत कार्रवाई होगी। इस पर विष्णु शंकर जैन ने कहा कि सेक्शन 3(ई) ऐसे मामलों को कवर करता है, जहां जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव हुआ हो।
एक अन्य याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि नए यूजीसी नियमों में रैगिंग से जुड़े प्रावधानों को हटा दिया गया है, जिससे शिक्षा व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि भविष्य में सामान्य वर्ग से आने वाले किसी फ्रेशर को पहले ही दिन अपराधी की तरह देखा जा सकता है, जो गंभीर चिंता का विषय है।
इस दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आजादी के 75 वर्षों बाद भी हम समाज को जातियों से मुक्त नहीं कर सके हैं, और यह विचारणीय है कि क्या यह नया कानून समाज को आगे ले जाने के बजाय पीछे की ओर तो नहीं धकेल रहा। उन्होंने यह भी कहा कि रेगुलेशन में प्रयुक्त भाषा से दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से नए यूजीसी रेगुलेशन को समाप्त करने और उस पर तत्काल रोक लगाने की मांग करते हुए कहा कि यदि अनुमति दी जाए, तो वे इससे अधिक संतुलित और समावेशी रेगुलेशन तैयार कर सकते हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह एक संवैधानिक विषय है। वहीं जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि अदालत समाज में निष्पक्ष और समावेशी वातावरण सुनिश्चित करने के सभी पहलुओं पर विचार कर रही है और यह भी सवाल उठाया कि जब सेक्शन 2(ई) पहले से मौजूद है, तो सेक्शन 2(सी) की प्रासंगिकता कैसे बनती है।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि विश्वविद्यालयों में अभी 2012 के नियम ही लागू रहेंगे। साथ ही केंद्र सरकार और UGC से इस विषय पर जवाब मांगा गया है। अदालत ने यह भी कहा कि यह परखा जाना जरूरी है कि नया नियम समानता के संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप है या नहीं।  साथ ही अदालत ने यूजीसी के नए रेगुलेशन पर फिलहाल रोक लगाते हुए स्पष्ट किया कि 19 मार्च तक 2012 के यूजीसी रेगुलेशन ही लागू रहेंगे।

सूत्रों के अनुसार, इस पूरे प्रकरण की समीक्षा के लिए एक विशेष समिति के गठन पर भी विचार किया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि UGC के नए नियमों को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। दिल्ली में UGC मुख्यालय के बाहर छात्रों और विभिन्न संगठनों द्वारा धरना-प्रदर्शन भी किया गया था।


नए नियमों को लेकर देशभर में विरोध


UGC द्वारा नए नियम जारी किए जाने के बाद से ही विभिन्न राज्यों में असंतोष देखा गया। यूपी के बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट रहे पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने नियमों से असहमति जताते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वहीं रायबरेली और लखनऊ में भी भाजपा से जुड़े कुछ नेताओं ने विरोध स्वरूप त्यागपत्र दिए हैं। इसी क्रम में छात्रों ने हाल ही में UGC मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया था।


नए नियमों में क्या है प्रावधान


UGC के नए नियमों के तहत कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसरों में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के साथ भेदभाव रोकने के लिए विशेष व्यवस्थाएं प्रस्तावित की गई हैं। इनमें अलग-अलग शिकायत समितियां, हेल्पलाइन, निगरानी टीमें और त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था शामिल है। नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों की मान्यता रद्द करने या फंड रोकने तक का प्रावधान भी किया गया है।
हालांकि, इन्हीं प्रावधानों को लेकर सामान्य वर्ग के कुछ संगठनों और व्यक्तियों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इससे कैंपस में नई प्रशासनिक और सामाजिक जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल टिप्पणियां- दावा क्या है, सच्चाई और सवाल क्या?

UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद सोशल मीडिया पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) से जुड़ी कुछ कथित टिप्पणियां तेजी से वायरल हो रही हैं। इन वायरल दावों में कहा जा रहा है कि अदालत ने जातिविहीन समाज की आवश्यकता पर जोर देते हुए यह प्रश्न उठाया है कि क्या नीतियां बनाते समय देश को बार-बार भूतकाल की सामाजिक संरचनाओं की ओर ले जाना उचित है।
वायरल पोस्ट्स में यह दावा भी सामने आ रहा है कि नई गाइडलाइंस एक ही पक्ष को ध्यान में रखकर बनाई गई प्रतीत होती हैं, जिससे समाज में संतुलन के बजाय वैचारिक टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इन कथित टिप्पणियों में यह तर्क भी दिया गया है कि जाति व्यवस्था का संपूर्ण दायित्व किसी एक वर्ग पर थोपकर समाज में नफरत और विभाजन को बढ़ावा देना समाधान नहीं हो सकता।
सोशल मीडिया पर प्रसारित दावों में यह प्रश्न भी उठाया गया है कि क्या मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन समुदायों में मौजूद सामाजिक वर्गीकरण भी किसी एक वर्ग द्वारा निर्मित बताए जा सकते हैं। साथ ही यह तर्क भी दिया जा रहा है कि यदि जाति पहचान से इतनी आपत्ति है, तो समाज को स्वयं भी नाम और पहचान से जाति हटाने जैसे कदमों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
इन वायरल टिप्पणियों में आगे यह भी कहा जा रहा है कि यदि कोई समाज IAS, IPS, CJI, राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुंचने के बावजूद स्वयं को लगातार शोषित ही मानता है, तो यह विषय केवल नीतिगत नहीं बल्कि मानसिक और वैचारिक आत्ममंथन से भी जुड़ा हुआ हो सकता है।
हालांकि, यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि इन कथित टिप्पणियों की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, न ही ये सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश या अधिकृत रिकॉर्ड का हिस्सा हैं। इसके बावजूद, यह बहस समाज और नीति-निर्माण के स्तर पर एक विचारणीय और सोचनीय प्रश्न जरूर खड़ा करती है, जिस पर संवैधानिक मूल्यों, समानता और सामाजिक संतुलन के दृष्टिकोण से गंभीर विमर्श आवश्यक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट जैसे संवैधानिक संस्थानों से जुड़ी किसी भी टिप्पणी को अंतिम रूप से केवल आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर ही स्वीकार किया जाना चाहिए, जबकि सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं को विवेक और संवेदनशीलता के साथ देखा जाना चाहिए। और इस पर विचार अवश्य करना चाहिए

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