26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर सियाचिन के अमर प्रहरीयों को काव्य नमन
|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
नई दिल्ली
By ACGN 7647981711, 9303948009
26 जनवरी गणतंत्र दिवस केवल संविधान, लोकतंत्र और अधिकारों का पर्व नहीं है, यह उन सपूतों को याद करने का दिन भी है, जिनकी वजह से हम सुरक्षित हैं, स्वतंत्र हैं और निश्चिंत होकर तिरंगे के नीचे सांस ले पाते हैं। जब पूरा देश उत्सव में डूबा होता है, तब भी कुछ लोग ऐसे हैं जो बर्फ़ की कब्र पर खड़े होकर देश की सीमाओं की रखवाली करते हैं। जहाँ ज़िंदगी ठिठुर जाती है, वहाँ वे अपने हौसले जलाए रखते हैं। जहाँ सांस लेना भी संघर्ष है, वहाँ वे मातृभूमि के लिए मुस्कुराते हुए डटे रहते हैं।
सियाचिन दुनिया की सबसे ऊँची और सबसे कठिन रणभूमि सिर्फ़ एक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों की अदम्य साहस गाथा है। यहाँ दुश्मन से ज़्यादा खतरनाक है प्रकृति, लेकिन फिर भी हमारे जवान तिरंगे को झुकने नहीं देते। इसी भावना को शब्दों में ढालती हुई कवियित्री मंजुला श्रीवास्तव की यह नई कविता, गणतंत्र दिवस पर हर भारतीय के हृदय को गर्व से भर देती है।
यह कविता उन पहरेदारों को सलाम है, जो मौत से आँख मिलाकर देश की रक्षा करते हैं।
ओ, सियाचिन के पहरेदारों…
मौत सी जहाँ, बहती है सर्द हवा
हर कदम पर मौत हो जहाँ
लौट सकोगे घर, यह भी नहीं होता पता
कैसे तुम वहाँ डट जाते हो?
ओ, सियाचिन के पहरेदारों,
शेर की दहाड़ों,
तुम मृत्यु को भी भय दिखाते हो
छोटी गलती की भी, जहाँ हो बड़ी सज़ा
प्राण वायु को भी, इंसान तरसता जहाँ
जहाँ बसता नहीं कोई, वहाँ बस जाते हो
तुम फ़र्ज़ यह कैसे निभाते हो?
ओ, सियाचिन के पहरेदारों,
शेर की दहाड़ों,
तुम मृत्यु को भी भय दिखाते हो
सबसे ऊँची रणभूमि विश्व की
तिरंगे से सजाते हो
देशभक्ति का जुनून क्या होता है?
यह दिखलाते हो
देशवासियों की सुरक्षा की कीमत
तुम चुकाते हो
ओ, सियाचिन के पहरेदारों,
शेर की दहाड़ों,
तुम असंभव को भी संभव कर दिखाते हो
तुम असंभव को भी संभव कर दिखाते हो
कवयित्री मंजुला श्रीवास्तव, नई दिल्ली
यह कविता केवल शब्द नहीं, बल्कि उस बलिदान की गूंज है, जिसकी बदौलत गणतंत्र सुरक्षित है। गणतंत्र दिवस पर ऐसे सपूतों को याद करना ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space
आणखी कथा






