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26 जनवरी : एक तारीख नहीं, वो इंकलाब है जिसमें लिखा है भारत का हक़

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संपादकीय

By ACGN 7647 9817119303 948009

गणतंत्र दिवस विशेष

प्रदीप मिश्रा

26 जनवरी कोई मामूली दिन नहीं है। यह वो दिन है जब भारत ने दुनिया से कहा था अब यह देश किसी ताज से नहीं, किसी ताकत से नहीं, बल्कि कानून और जनता की इच्छा से चलेगा।
यह दिन सिर्फ तिरंगा फहराने का नहीं, बल्कि यह याद करने का दिन है कि यह देश कैसे बना, क्यों बना और किसके लिए बना।
ये आज़ादी यूँ ही नहीं मिली थी,
इसके पीछे लहू, आह और इरादे थे,
ये संविधान काग़ज़ नहीं है साहब,
ये करोड़ों सपनों के वादे थे।
15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद तो हो गया, लेकिन तब भी एक खालीपन था। अंग्रेज़ चले गए थे, पर उनके बनाए कानून वहीं थे। सवाल यह था कि आज़ाद भारत में आम आदमी की कीमत क्या होगी। क्या गरीब की सुनी जाएगी, क्या आदिवासी को हक़ मिलेगा, क्या महिला सुरक्षित होगी, क्या हर इंसान बराबर माना जाएगा।
इसी सोच से संविधान बना। देश के कोने-कोने से आए लोगों ने बैठकर तय किया कि भारत सिर्फ आज़ाद नहीं, इंसाफ़ वाला देश बनेगा। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस संविधान को वह ताकत दी, जिससे कमजोर आदमी भी मजबूत के सामने खड़ा हो सके
किसी के नाम से नहीं, किसी की जात से नहीं,
ये देश चलेगा अब सिर्फ बराबरी की बात से नहीं,
संविधान बोला, सब एक समान हैं, कोई ऊँचा नहीं, कोई छोटा नहीं।
26 जनवरी 1950 को जब संविधान लागू हुआ, तब भारत ने असली मायनों में जन्म लिया। उस दिन भारत ने खुद को गणराज्य घोषित किया। मतलब साफ था,अब हुकूमत जनता की होगी। राजा नहीं, रियासत नहीं, बल्कि वोट की ताकत से सरकार बनेगी।
गणतंत्र का मतलब सिर्फ यह नहीं कि हम चुनाव में वोट डालते हैं। गणतंत्र का मतलब है कि हम सवाल पूछ सकते हैं, गलत के खिलाफ आवाज़ उठा सकते हैं और सच बोल सकते हैं। लेकिन इसका यह भी मतलब है कि हम जिम्मेदार नागरिक बनें।
हक़ मांगना आसान है, फर्ज़ निभाना थोड़ा भारी लगता है,
लोकतंत्र तभी जिंदा रहता है, जब नागरिक भी जिम्मेदारी समझता है।
पिछले पचहत्तर सालों में भारत ने बहुत कुछ झेला। कभी लोकतंत्र मजबूत हुआ, कभी उसे कमजोर करने की कोशिश हुई। आपातकाल आया, आंदोलनों की आग जली, सड़क से संसद तक आवाज़ गूंजी। लेकिन हर बार संविधान ने रास्ता दिखाया।
आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि आज लोकतंत्र सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है। राजनीति में शोर है, लेकिन संवाद कम है। अधिकारों की बात खूब होती है, पर कर्तव्यों की चर्चा कम होती है।
संविधान किताब में बंद न रहे, ये सवाल आज हर गली पूछती है,
अगर लोकतंत्र सो गया भीड़ में, तो सबसे पहले आवाज़ जनता की रूठती है।
गणतंत्र दिवस हमें आईना दिखाता है। यह पूछता है, क्या हम सिर्फ तिरंगे से प्यार करते हैं या उस संविधान से भी, जिसने तिरंगे को सम्मान दिया। क्या हम दूसरों की आज़ादी का सम्मान करते हैं या सिर्फ अपनी सुविधा देखते हैं।
भारत का भविष्य आज के युवाओं में है। अगर युवा सच और झूठ में फर्क करना सीख जाएँ, अगर वे सवाल पूछने से डरें नहीं, अगर वे नफरत से ऊपर उठें, तो भारत को कोई कमजोर नहीं कर सकता।
देश सिर्फ सरहद से नहीं बनता, देश बनता है सोच और विश्वास से,
अगर युवा जाग गया संविधान के साथ, तो भारत अडिग रहेगा हर आघात से।
26 जनवरी हमें याद दिलाता है कि यह देश किसी एक नेता, पार्टी या विचारधारा का नहीं है। यह देश संविधान का है। और जब तक संविधान जिंदा है, तब तक भारत जिंदा है।
ये गणतंत्र तभी सलामत रहेगा, जब हर दिल में इसका मान रहेगा,
संविधान रहेगा तो देश रहेगा, वरना सब कुछ सिर्फ एक नाम रहेगा।

प्रदीप मिश्रा
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