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सच की तह तक

लोकतंत्र मर रहा है और हम ताली बजा रहे हैं लोकतंत्र का सबसे बड़ा धोखा

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संपादकीय By ACGN 7647981711, 9303948009

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक

✍️ कलम की धार ✍️

जहाँ कलम सवाल पूछती है और सच सामने आता है…

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक “कलम की धार” जनहित, सत्य और सामाजिक सरोकारों की वह निर्भीक आवाज़ है, जो सत्ता के गलियारों से नहीं, बल्कि आम जनता के बीच से उठती है। यह मंच उन मुद्दों को सामने लाता है, जिन पर अक्सर चुप्पी थोप दी जाती है और उन सवालों को उठाता है जिनका जवाब समाज जानना चाहता है। कलम की धार में शामिल हैं, जनहित से जुड़े जमीनी मुद्दे, भ्रष्टाचार का बेबाक और तथ्यपरक विश्लेषण, राजनीति की चमक के पीछे की सच्ची तस्वीर, लोक पर्व, परंपरा, संस्कार और संस्कृति की पहचान, अपने क्षेत्र के पर्यटन स्थल और अनकही कहानियाँ, प्राचीन धरोहरों और विरासत पर आलोचनात्मक दृष्टि यह मंच उन लोगों के लिए है, जो सिर्फ देखना नहीं, लिखना चाहते हैं, जो चुप रहना नहीं, सवाल पूछना चाहते हैं और जो चाहते हैं कि उनके गांव, शहर और समाज की बात पूरे देश – प्रदेश तक पहुँचे। अगर आपके मन में कोई विचार है कोई सवाल है कोई पीड़ा है या अपने क्षेत्र की कोई सच्ची कहानी है तो कलम की धार आपके लिए खुला मंच है। आपकी कलम, समाज की ताकत बने! आपकी आवाज़, बदलाव की शुरुआत बने, अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का कलम की धार सच लिखने का साहस… हर सप्ताह रविवार को  अपने लेख, विचार या रिपोर्ट व्हाट्सएप करें 7647981711, 9303948009 पर आज का विषय- वोट बेचने वाली जनता और मालिक बनते नेताओं के बीच कुचलता लोकतंत्र—यह लेख आईना भी है और चेतावनी भी आलेख प्रदीप मिश्र 

वोट देने वाली जनता और राज करने वाले मालिक लोकतंत्र का सबसे बड़ा धोखा

राजनीति कभी सेवा हुआ करती थी, राजनीति कभी जिम्मेदारी थी, राजनीति कभी जनता की आवाज़ थी। लेकिन आज की राजनीति को देखिए और खुद से पूछिए—क्या यह वही राजनीति है, जिसके लिए लोगों ने जेलें काटीं, फांसी चढ़े, लाठियाँ खाईं। आज की राजनीति कुर्सी का खेल बन गई है, लूट का लाइसेंस बन गई है, जनता को मूर्ख समझने की सबसे बड़ी कला बन गई है। नेता आज भी वही पुराना डायलॉग बोलता है कि हम आपके सेवक हैं। चुनाव के समय हाथ जोड़ता है, पांव छूता है, आपके घर की चौखट पर बैठकर आपकी चाय पीता है, आपकी गरीबी पर आंसू बहाता है। लेकिन सत्ता मिलते ही वही सेवक मालिक बन बैठता है। फिर उससे मिलने के लिए सिफारिश लगानी पड़ती है, घंटों इंतजार करना पड़ता है, और अंत में जवाब मिलता है कि साहब व्यस्त हैं। पहले नेता जनता से डरता था, आज जनता नेता से डरती है, थाना हो, तहसील हो, अस्पताल हो या स्कूल हर जगह नेता का नाम लेकर डराया जाता है। ऊपर से फोन आ जाएगा, नेता नाराज़ हो जाएगा, समझ में नहीं आता यह लोकतंत्र है या डर का राज। आज हाल यह है कि वोट देने वाला खुद को कमजोर समझने लगा है और जिसको पांच साल के लिए कुर्सी सौंपी, वह खुद को राजा समझने लगा है। 1947 के बाद राजनीति में आने का मतलब था त्याग, सादगी और ईमानदारी। नेता पैदल चलता था, सादा रहता था और जनता के बीच रहता था। आज नेता बनने का मतलब है गाड़ी, गार्ड, पैसा, रौब और पावर। आज वही राजनीति में टिक पाता है जिसके पास पैसा है, जो झूठ अच्छे से बोल सकता है, जो भीड़ को भड़का सकता है, जो जाति और धर्म के नाम पर आग लगा सकता है। आज की राजनीति विकास की नहीं, नफरत की राजनीति बन चुकी है। आज नेता सड़क की बात नहीं करता, स्कूल की बात नहीं करता, अस्पताल की बात नहीं करता, रोजगार की बात नहीं करता। वह जाति की बात करता है, धर्म की बात करता है, मंदिर-मस्जिद की बात करता है। क्योंकि नफरत में सवाल नहीं होते। नफरत में दिमाग बंद हो जाता है और जब जनता सवाल पूछना बंद कर देती है, तब नेता मनमानी करता है। जो नेता कहता है कि यह मेरी जाति का है इसलिए इसे वोट दो या यह मेरे धर्म का है इसलिए इसे जिताओ, वह नेता नहीं है। वह देश को तोड़ने वाला आदमी है। देश जाति से नहीं चलता, देश धर्म से नहीं चलता, देश संविधान और जनता से चलता है। जाति और धर्म के नाम पर लड़वाना राजनीति नहीं, सबसे बड़ा गुनाह है। जनसेवक से वीआईपी बनने की पूरी कहानी भी यही है। चुनाव से पहले वही नेता चारपाई पर बैठता है, आम आदमी की भाषा बोलता है, आपकी समस्या सुनता है। चुनाव के बाद वही नेता वीआईपी बन जाता है। उसके आगे-पीछे गाड़ियों का काफिला होता है, पुलिस होती है, सायरन बजता है। सड़क आम आदमी के लिए बंद होती है, लेकिन नेता के लिए खुली रहती है। यह सेवा नहीं, यह अहंकार है। वीआईपी कल्चर जनता के पैसों की खुली बर्बादी है। नेता की सुरक्षा जनता के पैसे से, गाड़ी जनता के पैसे से, कार्यक्रम जनता के पैसे से। छोटा सा भाषण और खर्च लाखों में। अफसर परेशान, कर्मचारी परेशान, पुलिस परेशान और नेता मुस्कुराकर भाषण देकर चला जाता है। योजनाओं के नाम पर भी नाटक चलता है। फोटो खिंचती है, अख़बार में छपती है और फिर सब भूल जाते हैं। पेड़ लगाए गए, लेकिन कितने जिंदा हैं, यह कोई नहीं पूछता। मकान बने, लेकिन किसे मिले, यह कोई नहीं बताता। योजना का मकसद जनता की मदद नहीं, नेता की फोटो होती है। मुफ्त की रेवड़ी भी जनता को मजबूत करने के लिए नहीं, कमजोर रखने के लिए दी जाती है। नेता कहता है मुफ्त राशन देंगे, मुफ्त पैसा देंगे, मुफ्त सुविधा देंगे। लेकिन कोई यह नहीं कहता कि नौकरी देंगे, उद्योग लगाएंगे, आपको अपने पैरों पर खड़ा करेंगे। मुफ्त चीजें जनता को आश्रित बनाती हैं, आत्मनिर्भर नही4कमीशनखोरी आज राजनीति का सबसे बड़ा सच है। चुनाव में खर्च होता है, सत्ता में आकर उसकी वसूली होती है। ठेका बिकता है, पोस्टिंग बिकती है, ट्रांसफर बिकता है। नेता के नाम पर दलाल खुलेआम वसूली करते हैं। यह राजनीति नहीं, खुला धंधा है। आज छोटे-छोटे पदों पर बैठे नेता भी अपने आप को भगवान समझने लगे हैं। कर्मचारियों को धमकाना, जनता को डराना, वसूली करना इसे सेवा नहीं, गुंडागर्दी कहते हैं। विधायकों की पेंशन और जनता की हालत पर भी सोचिए। पांच साल कुर्सी पर बैठे और जिंदगी भर पेंशन। क्या राजनीति नौकरी है, क्या यह रिटायरमेंट प्लान है। किसान को क्या मिला, मजदूर को क्या मिला, युवा को क्या मिला, इन सवालों से नेता भागता है। लेकिन सबसे कड़वा सच यह है कि इसमें जनता भी दोषी है। जनता थोड़े पैसे में बिक जाती है, थोड़ी शराब में बहक जाती है, थोड़े लालच में फँस जाती है। फिर चुनाव के बाद कहती है कि नेता खराब है। नेता तभी खराब होता है, जब जनता कमजोर होती है। मतदान कोई रस्म नहीं है। मतदान आपका हथियार है। वोट आपकी ताकत है, आपकी आवाज़ है, आपका सम्मान है। वोट उसे दीजिए जो डराता न हो, जो जाति-धर्म की आग न फैलाए, जो पैसा और शराब बाँटकर आपको खरीदने की कोशिश न करे, जो खुद को मालिक नहीं, कर्मचारी समझे। लोकतंत्र अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन खतरे में जरूर है। अगर जनता अब भी नहीं जागी, तो आने वाला समय और भी अंधेरा होगा। याद रखिए जनता मालिक है और नेता सिर्फ पांच साल का कर्मचारी।

अब फैसला आपके हाथ में है, मालिक बनना है या गुलाम बने रहना है।

नेताओं के लिए चेतावनी

यह लेख सिर्फ जनता के लिए नहीं, नेताओं के लिए भी है। जनता अब चुप नहीं रहेगी। वोट मांगते समय झुकने वाला नेता अगर जीतने के बाद आंख दिखाएगा, तो वही जनता उसे उसकी जगह दिखाएगी। सत्ता सेवा के लिए है, रौब दिखाने के लिए नहीं। जनता को कमजोर समझने की भूल मत करना। आज वोट से सत्ता मिलती है, कल वही वोट सत्ता छीनना भी जानता है। अगर नेता नहीं सुधरे, तो इतिहास गवाह है—जनता देर से सही, लेकिन फैसला जरूर करती है।

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