बसंत पंचमी : ज्ञान का बसंत और चेतना का उत्सव
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संपादकीय
बसंत पंचमी विशेष
By ACGN 7647981711, 9303 948009
सरस्वती पूजा के माध्यम से शिक्षा को करुणा विवेक और संतुलन से जोड़ने की भारतीय परंपरा
जब ऋतु बदलती है, तब शिक्षा बोल उठती है
बसंत पंचमी केवल पंचांग की एक तिथि नहीं है, बल्कि वह क्षण है जब प्रकृति और मानव चेतना एक साथ करवट बदलती हैं। शीत ऋतु की जड़ता धीरे-धीरे ढलने लगती है और वातावरण में एक नई ऊष्मा, हल्कापन और सृजन की गंध फैल जाती है। यही वह समय होता है जब मनुष्य का मन भी भीतर से जागता है। भारत में इसी परिवर्तन को बसंत पंचमी के रूप में स्वीकार किया गया है, जहाँ ऋतु परिवर्तन केवल मौसम तक सीमित नहीं रहता बल्कि शिक्षा और चेतना के स्तर पर भी अपना प्रभाव छोड़ता है।
ऋतु परिवर्तन: प्रकृति की मौन पाठशाला
वैज्ञानिक दृष्टि से ऋतु परिवर्तन पृथ्वी की धुरी के झुकाव और सूर्य के चारों ओर उसकी परिक्रमा का परिणाम है, लेकिन भारतीय जीवन दर्शन में इसे प्रकृति की पाठशाला माना गया है। शीत ऋतु के दौरान पेड़-पौधे अपने पत्ते गिरा देते हैं, धरती विश्राम करती है और जीवन ठहराव में चला जाता है। फिर अचानक कोई घोषणा नहीं होती, पर बसंत आ जाता है। खेतों में सरसों के पीले फूल खिल उठते हैं, आम के पेड़ों पर बौर दिखाई देने लगता है और वातावरण में जीवन की नमी लौट आती है। यह परिवर्तन मनुष्य को सिखाता है कि ठहराव स्थायी नहीं होता और हर अंत के बाद एक नया आरंभ संभव है।
बसंत पंचमी: ऋतु से चेतना तक का सफर
बसंत पंचमी उस सांस्कृतिक स्वीकारोक्ति का नाम है जिसमें यह माना गया कि ज्ञान का बीजारोपण भी ऋतु के साथ जुड़ा है। जैसे प्रकृति बसंत में सृजन की अवस्था में होती है, वैसे ही मानव मस्तिष्क भी इस समय सीखने और समझने के लिए अधिक अनुकूल होता है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा ने इस दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की आराधना को महत्व दिया। यह पूजा किसी वरदान की याचना नहीं बल्कि ज्ञान के प्रति कृतज्ञता का भाव है।
मां सरस्वती: केवल देवी नहीं, ज्ञान की चेतना
मां सरस्वती को केवल एक धार्मिक प्रतीक के रूप में देखना उनके अर्थ को सीमित कर देता है। वे भारतीय दर्शन में ज्ञान, विवेक, वाणी और संतुलन की चेतना हैं। उनका श्वेत वस्त्र आंतरिक शुद्धता का संकेत देता है, वीणा जीवन में संतुलन और अनुशासन का प्रतीक है और उनके हाथ में धारण की गई पुस्तक यह बताती है कि सीखना कभी पूर्ण नहीं होता। उनका शांत और मौन स्वरूप यह सिखाता है कि सच्चा ज्ञान शोर नहीं करता, वह भीतर से परिपक्व बनाता है।
शिक्षा में मां सरस्वती का नाम क्यों जुड़ा
भारतीय शिक्षा परंपरा में शिक्षा को केवल कौशल या रोजगार से नहीं जोड़ा गया, बल्कि उसे चरित्र और चेतना के निर्माण का माध्यम माना गया। यही कारण है कि शिक्षा का आरंभ मां सरस्वती के स्मरण से होता है। यह स्मरण यह स्वीकार करता है कि ज्ञान मनुष्य से बड़ा है और उसे विनम्र बनाता है। मां सरस्वती का नाम शिक्षा को उत्तरदायित्व, संयम और नैतिकता से जोड़ता है, जो आधुनिक प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा व्यवस्था में धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।
विद्यालयों में बसंत पंचमी का जीवंत दृश्य
बसंत पंचमी के दिन विद्यालयों का वातावरण सामान्य दिनों से अलग दिखाई देता है। कक्षाओं में केवल पाठ नहीं पढ़ाया जाता, बल्कि अनुभव रचा जाता है। छात्र-छात्राएँ पीले वस्त्र पहनते हैं, अपनी पुस्तकों और वाद्य यंत्रों को मां सरस्वती के चरणों में रखते हैं और शिक्षक तथा विद्यार्थी एक साझा सांस्कृतिक क्षण के सहभागी बनते हैं। उस दिन प्रतियोगिता की दौड़ थमती है और शिक्षा अपने मूल स्वरूप में सामने आती है।
बच्चों के मन पर पड़ता गहरा प्रभाव
मां सरस्वती की पूजा बच्चों के भीतर एक सूक्ष्म लेकिन गहरा परिवर्तन लाती है। यह उन्हें यह अनुभव कराती है कि सीखना केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए है। इस आयोजन से बच्चों में एकाग्रता, अनुशासन और ज्ञान के प्रति सम्मान विकसित होता है। वे समझते हैं कि ज्ञान कोई वस्तु नहीं जिसे जीता जा सके, बल्कि एक यात्रा है जिसे धैर्य के साथ तय करना होता है।
ऋतु परिवर्तन और शिक्षा का मनोवैज्ञानिक संबंध
शोध बताते हैं कि बसंत ऋतु मानव मस्तिष्क में सकारात्मकता और सृजनशीलता को बढ़ाती है। जब इसी समय शिक्षा को सांस्कृतिक और भावनात्मक अनुभव से जोड़ा जाता है, तो बच्चों में आत्मविश्वास और भावनात्मक संतुलन स्वाभाविक रूप से विकसित होता है। मां सरस्वती की पूजा इस प्राकृतिक प्रक्रिया को अर्थ देती है और शिक्षा को केवल बौद्धिक अभ्यास न रहने देकर आंतरिक विकास की यात्रा बना देती है।
शिक्षक: केवल अध्यापक नहीं, संस्कृति के संवाहक
बसंत पंचमी के अवसर पर शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले नहीं रहते। वे बच्चों को यह सिखाते हैं कि ज्ञान के साथ विनम्रता क्यों आवश्यक है और शिक्षा का उद्देश्य केवल सफलता नहीं बल्कि मानवता का संरक्षण भी है। यह भूमिका आज के तकनीक-प्रधान शिक्षा युग में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
वैश्विक शिक्षा के लिए भारतीय संदेश
आज दुनिया भर में शिक्षा तकनीकी दक्षता पर केंद्रित होती जा रही है, लेकिन इसके साथ नैतिक और भावनात्मक संकट भी उभर रहे हैं। विद्यालयों में मां सरस्वती की पूजा भारतीय शिक्षा दृष्टि को सामने रखती है, जहाँ ज्ञान को प्रकृति, ऋतु और संस्कृति से जोड़कर देखा जाता है। यह परंपरा वैश्विक शिक्षा को यह संदेश देती है कि शिक्षा केवल मस्तिष्क नहीं, अंतरात्मा का भी विषय है।
आत्मा तक पहुँचती शिक्षा
बसंत पंचमी पर विद्यालयों में मां सरस्वती की पूजा शिक्षा का आत्मिक उत्सव है। यह पर्व याद दिलाता है कि जैसे ऋतुएँ बदलती हैं, वैसे ही मनुष्य को भी भीतर से बदलना होता है। यह परंपरा बताती है कि शिक्षा तब ही सार्थक है जब वह मनुष्य को संवेदनशील, विनम्र और विवेकशील बनाए। यही भारतीय शिक्षा दर्शन का मूल है और यही उसका वैश्विक संदेश भी।
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