सात करोड़ का धान, चूहे जिम्मेदार और सिस्टम बेकसूर
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कवर्धा, छत्तीसगढ़
By ACGN | 7647981711, 9303948009
जब गोदाम बोले : साहब, धान नहीं था… चूहे थे
कवर्धा:- छत्तीसगढ़ के कवर्धा में जो घटा उसे घोटाला कहना तथ्यों के साथ बेईमानी होगी क्योंकि यह व्यवस्था की वह उत्कृष्ट प्रस्तुति है जहाँ सात करोड़ का धान नहीं चोरी होता बल्कि “खाया” जाता है और खाने वाले कोई नेता या अफसर नहीं बल्कि चूहे, दीमक और मौसम घोषित किए जाते हैं यानी लोकतंत्र में अब भ्रष्टाचार नहीं होता वह प्राकृतिक आपदा बन चुका है जिसमें 26 हजार क्विंटल धान न आग में जलता है न बाढ़ में बहता है न किसी दुश्मन देश द्वारा लूटा जाता है बल्कि सरकारी गोदाम में नियमों के भीतर अदृश्य हो जाता है और प्रशासन पूरे आत्मविश्वास से बताता है कि चूहे क्विंटल में खाते हैं दीमक फाइलें चबाती है और मौसम जवाबदेही उड़ा ले जाता है क्योंकि यह वही सिस्टम है जो हर बड़े मामले के बाद और ज्यादा निडर ज्यादा रचनात्मक और ज्यादा निर्लज्ज हो जाता है जहाँ पहली बार जीव जंतुओं को भ्रष्टाचार की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया गया है और अब तक बदनाम नेता अफसर दलाल और ठेकेदार राहत की सांस ले रहे हैं क्योंकि कवर्धा ने नया मानक तय कर दिया है यहाँ चूहे मुख्य अभियुक्त हैं और वे भी ऐसे प्रशिक्षित चूहे जो तौल पर्ची समझते हैं स्टॉक रजिस्टर में एंट्री करवाते हैं निरीक्षण रिपोर्ट संतोषजनक लिखवाते हैं फर्जी बिलों से पेट भरते हैं और जाते जाते CCTV कैमरों से आँख मिलाकर निकल जाते हैं मानो कह रहे हों कि आप भी सिस्टम का हिस्सा हैं और असली सवाल यह नहीं है कि धान कैसे गायब हुआ बल्कि यह है कि इतना सब होने के बाद भी सिस्टम बिना झुके बिना शर्माए कैसे खड़ा है क्योंकि गोदामों में धान आता है तौला जाता है सील होता है निरीक्षण होता है हस्ताक्षर होते हैं मुहरें लगती हैं और फिर एक दिन पता चलता है कि धान कभी था ही नहीं और इसे जादू समझना भोलेपन की हद होगी क्योंकि यह प्रशासनिक कला है जिसे भ्रष्टाचार कहना इस कला का अपमान होगा क्योंकि यह वह शिल्प है जहाँ चूहे अनाज खाते हैं दीमक जवाबदेही कुतरती है और मौसम हर घोटाले के बाद कभी नमी कभी बारिश कभी लंबे भंडारण का बहाना बनकर अचानक सक्रिय हो जाता है जिससे लगता है कि प्रकृति अब सरकारी तंत्र की स्थायी साझेदार बन चुकी है विपक्ष इसे घोटाला कहकर अपनी रस्म निभा लेता है जनता हँसते हुए मीम बना लेती है और प्रशासन कुछ निलंबन कुछ नोटिस जारी कर लोकतांत्रिक शोकसभा पूरी कर लेता है क्योंकि यहाँ निलंबन सज़ा नहीं परंपरा है और नोटिस सवाल नहीं ढाल है जबकि असली दोषी वहीं सुरक्षित रहते हैं जहाँ हर घोटाले के बाद रहते हैं फाइलों के पीछे पदों के ऊपर और सत्ता की छाया में और यह पूरा मामला बताता है कि भ्रष्टाचार अब चोरी नहीं करता बल्कि नियमों का पालन करता है कागज़ पूरे हैं हस्ताक्षर पूरे हैं मुहरें पूरी हैं कमी सिर्फ गोदाम में है और जब कमी पकड़ी जाती है तो कारण इतने प्राकृतिक होते हैं कि मानव जिम्मेदारी की जरूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि अगर किसी किसान के घर से एक बोरी धान गायब हो जाए और वह कह दे कि चूहे खा गए तो उससे पूछा जाएगा ताला क्यों नहीं लगाया लेकिन जब सरकारी गोदाम से सात करोड़ का धान गायब होता है तो सवाल बदल जाता है कि बेचारे चूहे क्या करें यही शासन और आम आदमी का फर्क है जहाँ आम आदमी हमेशा दोषी और सिस्टम हमेशा पीड़ित होता है और सबसे खतरनाक यह नहीं कि धान गायब हुआ बल्कि यह है कि सिस्टम शर्मिंदा नहीं है वह सफाई दे रहा है तर्क दे रहा है और आत्मविश्वास से आगे बढ़ रहा है क्योंकि जब घोटाला रोजमर्रा की प्रक्रिया बन जाए तब लोकतंत्र सिर्फ चुनावी रस्म बनकर रह जाता है और कवर्धा ने यह साबित कर दिया है कि आज के शासन में सबसे सुरक्षित प्राणी चूहा है न उसे गिरफ्तार किया जा सकता है न उससे पूछताछ क्योंकि चूहा भूखा होता है और व्यवस्था लालची और यह लेख किसी चूहे के खिलाफ नहीं बल्कि उस तंत्र के खिलाफ है जिसने चूहे को ढाल बना लिया है क्योंकि सच्चाई यही है कि धान चूहों ने नहीं खाया धान व्यवस्था ने खाया है और जब व्यवस्था खुद खाने लगे तब देश सिर्फ गोदाम नहीं खोता अपना भरोसा अपनी नैतिकता और अपना लोकतांत्रिक विवेक भी खो देता है।
प्रदीप मिश्रा
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