जहां जंगल थे, वहां अब ज़हर है राख प्रदूषण ने छीनी सांसें, हसदेव रो रही है, सरकार मौन है
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संपादकीय
By ACGN 7647981711, 9303948009
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक
✍️ कलम की धार ✍️
जहाँ कलम सवाल पूछती है और सच सामने आता है…
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आज का विषय- उद्योगों के आने से पहले और बाद का कोरबा–रायगढ़, राख डैम, सिलिका धूल, बीमारियां और टूटता ग्रामीण जीवन
आलेख – प्रदीप मिश्रा
राख प्रदूषण की चादर में घुटता हसदेव अंचल, उद्योगों के विकास का काला सच, प्रबंधन–प्रशासन–पर्यावरण विभाग की लापरवाही और जनआंदोलन की अनसुनी चीख
हसदेव नदी को कोरबा अंचल की जीवन दायिनी कहा जाता रहा है। यही नदी खेतों को सींचती थी, जंगलों को हरा रखती थी, आदिवासी और ग्रामीण समाज की आजीविका का आधार थी। कभी इस क्षेत्र की सुबह चिड़ियों की आवाज़ से शुरू होती थी, हवा में जंगलों की खुशबू होती थी और खेतों में मेहनत की हरियाली दिखती थी। लेकिन समय के साथ विकास के नाम पर आए उद्योगों, बिजली संयंत्रों और खदानों ने इस जीवन दायिनी अंचल की तस्वीर ही बदल दी। आज कोरबा और पड़ोसी रायगढ़ जिले के कई गांव राख प्रदूषण, जहरीली हवा, दूषित पानी और बीमारियों के साए में जी रहे हैं। यह कोई एक घटना या एक संयंत्र की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस पूरे सिस्टम का सच है, जहां उद्योग, प्रशासन और पर्यावरण विभाग की लापरवाही ने आम जनता को अपने हाल पर छोड़ दिया है।
उद्योगों के आने से पहले का कोरबा
उद्योगों के आगमन से पहले कोरबा एक शांत वन ग्रामीण अंचल था। हसदेव नदी का साफ पानी, घने जंगल, उपजाऊ खेत और मजबूत सामाजिक ताना-बाना यहां की पहचान था। लोग खेती, वनोपज और नदी आधारित आजीविका पर निर्भर थे। बीमारियां कम थीं, हवा और पानी शुद्ध था, और पर्यावरण जीवन का हिस्सा था, बोझ नहीं। गांवों में तालाब थे, कुएं थे, नाले थे। गर्मियों में भी पानी की इतनी किल्लत नहीं होती थी कि लोगों को सड़क पर उतरना पड़े। बच्चों की सांसें राख से भरी नहीं होती थीं और बुजुर्ग खांसी–दमे से नहीं जूझते थे।
उद्योग आए, वादे किए गए
जब कोरबा में बड़े-बड़े उद्योग, ताप विद्युत संयंत्र और खदानें आईं, तब स्थानीय लोगों को रोजगार, सड़क, स्कूल, अस्पताल और समृद्धि के सपने दिखाए गए। कहा गया कि यह क्षेत्र राज्य की ऊर्जा राजधानी बनेगा और विकास की नई इबारत लिखेगा। शुरुआत में कुछ रोजगार मिले, कुछ सड़कें बनीं, लेकिन धीरे-धीरे विकास का असली चेहरा सामने आने लगा। रोजगार सीमित लोगों तक सिमट गया और उसका बोझ पूरे समाज ने उठाया प्रदूषण के रूप में।
राख डैम और उड़ती ज़िंदगी

ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली फ्लाई ऐश यानी राख को वैज्ञानिक ढंग से निस्तारित करने के दावे कागजों तक ही सीमित रह गए। राखड डैम बनाए गए, लेकिन उनमें राखड़ गिला रखने के लिए न तो स्प्रिंकलर लगाए गए, न ही नियमित पानी का समुचित छिड़काव हुआ। नतीजा यह है की इन राखड डेमो सफ़ेद राख हवा के साथ राख उड़कर गांवों, खेतों, जंगलों और नदियों तक और सांसो के जरिये आम आदमी के शरीर में पहुंचने लगी। यह राख सिर्फ धूल नहीं है। इसमें सिलिका और अन्य केमिकल तत्व होते हैं, जो जमीन को बंजर बनाते हैं, पानी को जहरीला करते हैं और इंसानी शरीर में जाकर गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। जिससे लोग तरह तरह की बीमारियों से जूझ रहे हैं
राख परिवहन का बेकाबू सच

यह स्थिति तब और भयावह हो गई जब राख के तथाकथित उपयोग के नाम पर उसका अंधाधुंध परिवहन शुरू हुआ। कोरबा और रायगढ़ जिलों की सड़कों पर दिन–रात राख से भरे ट्रक दौड़ने लगे। नियम कहते हैं कि राख परिवहन के दौरान वाहन पूरी तरह ढके हों, क्षमता से अधिक लोड न हो और गति नियंत्रित रहे, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। ग्रामीण बताते हैं कि ट्रक ओवरलोडेड होते हैं, ऊपर तक राख भरी होती है, नाम मात्र के लिए तिरपाल डाली जाती है, जो हवा में उड़ जाती है। तेज रफ्तार में चलते वाहनों से राख सड़कों पर गिरती है, उड़ती है और सीधे लोगों की आंखों, नाक और फेफड़ों में पहुंचती है।
बात यही खत्म नहीं होती राख परिवहन करने वाले इसे कमाई का जरिया बनाते हुए इस जहरीली राख को यहाँ वहा कही भी खुले में दल देते हैं कुछ जगहों पर तो राख को जंगलों में गड्ढों में डाल दिया गया। इससे हरा–भरा क्षेत्र भी प्रदूषण की चपेट में आ गया। जमीन की ऊपरी परत नष्ट हो रही है, पेड़ सूख रहे हैं और वन्यजीवों के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है।
मानव जीवन पर पड़ता कहर

राख प्रदूषण का सबसे गहरा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ा है। गांवों में सांस की बीमारियां आम हो गई हैं। बच्चों में अस्थमा, बुजुर्गों में टीबी जैसे लक्षण, आंखों में जलन, त्वचा रोग और लगातार खांसी अब सामान्य बात हो गई है। ग्रामीण बताते हैं कि पहले गांव में शायद ही कोई गंभीर बीमारी से मरता था, लेकिन अब बीमारियों से मौतें बढ़ रही हैं। इलाज के लिए दूर शहर जाना पड़ता है, जहां खर्च उठाना हर किसी के बस की बात नहीं। इस राख से जीवन अस्त व्यस्त हो गया है वाही राखड डेम के समीप रहने वाले ग्रामीणों का जीवन और भी बेहाल हो गया है खाना बनाते समय खाना पर राख उड़कर गिर जाती है स्कूल में बच्चो की पढाई के समय उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है बच्चो को तरह तरह की त्वचा संबधी और सासों की गंभीर बिमारियां हो रही है खेतो में फसले बर्बाद होती है
यह सवाल उठता है कि जिन उद्योगों ने इस क्षेत्र को ऊर्जा दी, क्या वे यहां के लोगों की सेहत की जिम्मेदारी से भी मुंह मोड़ सकते हैं?
हसदेव नदी पर मंडराता खतरा
हसदेव नदी केवल पानी का स्रोत नहीं है, यह इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और आर्थिक रीढ़ है। लेकिन राख और औद्योगिक प्रदूषण ने इसे भी नहीं छोड़ा। राख के कण बारिश के साथ बहकर नदी में पहुंचते हैं, जिससे पानी की गुणवत्ता गिरती जा रही है। ग्रामीण कहते हैं कि पहले नदी का पानी पीने और नहाने लायक था, आज वह संदेह के घेरे में है। मछलियां कम हो रही हैं, जलचर जीवन प्रभावित हो रहा है। जीवन दायिनी हसदेव अब खुद जीवन के लिए संघर्ष कर रही है। जहाँ एक और शासन नदियों नालो और जल संरक्षण की बात करती है वाही इन राखड डेमो से राख मिला पानी सीधे हसदेव नदी में प्रवाहित किया जा रहा है राख से पानी के साथ साथ नदी भी राख से पटती जा रही है इसी नदी के पानी को लोगो के पिने के पानी के रूप में उपयोग में ला रहे है नतीजतन लोगो को मुह , दांतों, मसुडो से जुडी परेशानियों ने जकड रखा है
प्रबंधन की जिम्मेदारी या सिर्फ दिखावा
कोरबा जिले के एनटीपीसी, सीएसईबी वेदांता बालको और रायगढ़ जिले के लारा, जिंदल जैसे बड़े प्रबंधन दावा करते हैं कि वे पर्यावरण मानकों का पालन कर रहे हैं। और सीएसआर के तहत प्रभावित ग्रामो का विकास जिसमे प्रभावित छेत्रो में सड़क बिजली पानी और प्रभावित लोगो की नियमित स्वास्थ्य की जाँच के साथ चातिपुर्ती के रूप में सहायता की जाती है उनके द्वारा विकास कार्यों की सूची भी दिखाई जाती है। लेकिन प्रभावित गांवों में जाकर देखने पर यह सब कागजी साबित होता है। ग्रामीणों का कहना है कि विस्थापन और प्रभावित क्षेत्रों के लिए स्वीकृत राशि उनकी वास्तविक जरूरतों पर खर्च नहीं होती। नाम के लिए सड़कें बना दी जाती हैं, लेकिन पीने का पानी, स्वास्थ्य सुविधा और प्रदूषण नियंत्रण पर गंभीरता नहीं दिखाई देती।
पर्यावरण विभाग की चुप्पी
सबसे बड़ा सवाल पर्यावरण विभाग की भूमिका पर है। जब सड़क पर उड़ती राख दिखती है, जब गांवों में बीमारियां बढ़ती हैं, जब जंगलों में राख डाली जाती है, तब विभाग की आंखें क्यों बंद रहती हैं? क्या निरीक्षण केवल फाइलों में होते हैं? क्या रिपोर्टें पहले से तय निष्कर्ष के साथ तैयार होती हैं? ग्रामीणों को लगता है कि पर्यावरण विभाग उद्योगों के सामने बेबस या उदासीन बना हुआ है।
आंदोलन और अनसुनी आवाज़

इन सबके बाद इन सब परेशानियों से परेशान होकर जब पानी सिर से ऊपर चला जाता है , तब ग्रामीण सड़कों पर उतरते हैं । धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन – हर लोकतांत्रिक तरीके से शासन और प्रशासन तक बात पहुंचाने की कोशिश करते है तब दिखावा के लिए शासन प्रशासन के अधिकारी और प्रबंधन के लो आते हैं भोले भाले ग्रामीणों की बाते सुनते हैं लेकिन ग्रामीणों का दर्द यह है कि हर आंदोलन के बाद आश्वासन मिलता है, बैठकें होती हैं, लेकिन जमीन पर हालात जस के तस रहते हैं। अधिकारी आते हैं, बंद गाड़ियों से निरीक्षण करते हैं और चले जाते हैं। समस्याएं वही रह जाती हैं, उन्हें झेलने वाले वही लोग।
ग्रामीण पूछते हैं कि, क्या विकास का मतलब हमारी सांसें छीन लेना है या उद्योगों की जिम्मेदारी केवल मुनाफा कमाना है? क्या पर्यावरण कानून सिर्फ कागजों के लिए बने हैं और शासन प्रशासन की जिम्मेदारी केवल रिपोर्ट पढ़ने तक सीमित है?
इस भयावह स्थिति का समाधान असंभव नहीं है। यदि राख डैम में नियमित स्प्रिंकलर सिस्टम से पानी का छिड़काव हो, यदि राख परिवहन पर सख्ती से नियम लागू हों, यदि सड़कों पर लगातार पानी डाला जाए, तो उड़ती राख पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। इसके साथ ही प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य शिविर, स्वच्छ पेयजल की स्थायी व्यवस्था, पर्यावरण निगरानी और जन सहभागिता जरूरी है। उद्योगों को केवल उत्पादन नहीं, बल्कि लोगों और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी भी निभानी होगी।
प्रशासन, शासन और प्रबंधन से सीधे पूछे जाने वाले 10 सवाल
क्या कोरबा और रायगढ़ में फ्लाई ऐश प्रबंधन के लिए बने नियम केवल कागजों तक सीमित हैं, या उनका वास्तविक पालन भी कहीं हो रहा है
ओवरलोड और बिना पूरी तरह ढंके राख परिवहन करने वाले वाहनों पर अब तक कितनी ठोस कार्रवाई की गई है, और उसका सार्वजनिक रिकॉर्ड कहां है
राख डैमों में नियमित स्प्रिंकलर सिस्टम और पानी छिड़काव की व्यवस्था क्यों नहीं है, जबकि यही प्रदूषण रोकने का सबसे बुनियादी उपाय है
क्या पर्यावरण विभाग ने कभी प्रभावित गांवों में जाकर लोगों के स्वास्थ्य, पानी और जमीन की वास्तविक स्थिति की स्वतंत्र जांच कराई है
यदि हसदेव नदी जीवन दायिनी है, तो उसके जल में राख और औद्योगिक कचरे के पहुंचने पर जिम्मेदारी किसकी तय होती है
एनटीपीसी, सीएसईबी वेदांता बालको और लारा, जिंदल जैसे बड़े प्रबंधन अपने सीएसआर फंड का कितना प्रतिशत वास्तव में प्रदूषण से प्रभावित गांवों पर खर्च कर रहे हैं
विस्थापित और प्रभावित क्षेत्रों के लिए स्वीकृत बजट का हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता
जब ग्रामीण आंदोलन करते हैं, तो केवल आश्वासन देकर मामला शांत क्यों किया जाता है, स्थायी समाधान क्यों नहीं दिया जाता
क्या शासन यह स्वीकार करेगा कि औद्योगिक विकास की निगरानी में प्रशासनिक विफलता हुई है, और यदि हां तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा
सबसे बड़ा सवाल—यदि यही हालात बने रहे, तो क्या आने वाले वर्षों में कोरबा–रायगढ़ रहने योग्य रह पाएंगे, या यह क्षेत्र सिर्फ उत्पादन क्षेत्र बनकर मानव जीवन से खाली हो जाएगा
प्रशासनिक निरीक्षण बंद गाड़ियों से होते हैं, रिपोर्टें वातानुकूलित कमरों में बनती हैं और प्रभावित ग्रामीण हर दिन खुले आसमान के नीचे राख खाते हुए जीते हैं। यह असंतुलन ही इस लेख का मूल प्रश्न है।
“कलम की धार” का उद्देश्य केवल समस्या बताना नहीं, बल्कि सत्ता और व्यवस्था को आईना दिखाना है। यदि आज भी चेतावनी को अनदेखा किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।
छत्तीसगढ़ की ऊर्जा राजधानी कहलाने वाला कोरबा आज विकास और विनाश के बीच खड़ा है। जिस औद्योगिक प्रगति को राज्य की ताकत बताया गया, वही प्रगति आज ग्रामीणों के लिए अभिशाप बनती जा रही है। उड़ती राख, जहरीली हवा, बीमार शरीर और सूखती जीवन दायिनी हसदेव नदी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या विकास की कीमत आम नागरिक की सांसों से चुकाई जाएगी।
यह लेख किसी एक उद्योग, एक अधिकारी या एक विभाग के खिलाफ नहीं है। यह उस पूरे तंत्र पर सवाल है, जिसने पर्यावरणीय नियमों को कागजों में कैद कर दिया और जमीनी सच्चाई से आंखें मूंद लीं। जब राख डैम से उड़ती सिलिका धूल बच्चों के फेफड़ों में जाती है, जब ओवरलोड राख परिवहन से सड़कें और जंगल दोनों दूषित होते हैं, तब यह केवल पर्यावरण का नहीं बल्कि मानवाधिकार का भी संकट बन जाता है। यह किसी आंदोलन की घोषणा नहीं, बल्कि अंतिम चेतावनी है। यदि अब भी राख पर पानी नहीं डाला गया, अब भी नियमों पर सख्ती नहीं हुई, हसदेव को बचाने का निर्णय नहीं लिया गया|”तो इतिहास यह दर्ज करेगा कि छत्तीसगढ़ में विकास हुआ, लेकिन इंसान हार गया। यह कहानी सिर्फ कोरबा और रायगढ़ की नहीं है। यह उस विकास मॉडल की कहानी है, जो अगर नहीं सुधरा, तो पूरे प्रदेश को राख में बदल सकता है। सवाल यह है कि क्या शासन प्रशासन अब भी जागेगा या हसदेव और उसके लोगों की यह चीख भी फाइलों में दब जाएगी।
प्रदीप मिश्रा
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