“राख से घुटता गांव, काम बंद कर बोले ग्रामीण अब नहीं सहेंगे”
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कोरबा, छत्तीसगढ़
ग्रामीण बनाम प्रबंधन: राखड़ डैम बना ज़हर का मैदान, कानून मौन और जनता त्रस्त
By ACGN 7647981711, 9303948009
कोरबा। जिले के एचटीपीएस पावर प्लांट से निकलने वाली राख के निपटान के लिए झाबु नवागांव के समीप बनाए गए राखड़ डैम ने अब ग्रामीणों के लिए जीवन और स्वास्थ्य पर सीधा हमला शुरू कर दिया है। जनवरी से मई तक तेज हवाओं के साथ उड़ने वाली सफेद राख ने खेत, घर, स्कूल, सड़क और सांस सब कुछ राख में बदल दिया है। इसी त्रासदी के खिलाफ गुरुवार को ग्रामीणों ने सरपंच लखन सिंह कंवर के नेतृत्व में राखड़ डैम का संपूर्ण कार्य बंद कर आंदोलन शुरू कर दिया।

ग्रामीणों का आरोप है कि राखड़ डैम परिसर में स्वयं चेतावनी बोर्ड लगे हैं जिनमें साफ लिखा है कि यह राख मानव जीवन के लिए हानिकारक है, इसके बावजूद CSEB प्रबंधन और पर्यावरण विभाग ने इसे खुला छोड़ रखा है। यह स्थिति सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम और जल संरक्षण कानूनों का उल्लंघन है, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंख मूंदे बैठे हैं।
आंदोलन के दौरान कार्यस्थल पर कनिष्ठ अभियंता साहू और सहायक अभियंता तंवर मौजूद थे। ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा रखते हुए प्रारंभ में उन्हें फूलों की माला पहनाकर सम्मान भी दिया,

लेकिन जब उड़ती राख पर ठोस कार्रवाई और उच्च अधिकारियों से मुलाकात की मांग उठी, तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई। बहस बढ़ते ही कनिष्ठ अभियंता द्वारा 112 पर कॉल कर दी गई, जो ग्रामीणों के आक्रोश को और भड़काने वाला कदम साबित हुआ।

112 की टीम मौके पर पहुंची और हालात की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली थाना प्रभारी नागेश कुमार तिवारी को सूचना दी गई। जानकारी मिलते ही थाना प्रभारी अपनी टीम के साथ राखड़ डैम पहुंचे। मौके पर उड़ती राख, ढंके हुए घर और दमघोंटू वातावरण को देखकर थाना प्रभारी ने स्थिति की गंभीरता को तुरंत समझा।

ग्रामीणों ने थाना प्रभारी को बताया कि वे महीनों से उच्च अधिकारियों से मिलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मौके पर मौजूद अधिकारी न तो मुलाकात करवाते हैं और न ही उनकी बात ऊपर तक पहुंचने देते हैं। उल्टे दबाव, टालमटोल और आश्वासन देकर उन्हें चुप कराने का प्रयास किया जाता है।

ग्रामीणों ने बताया कि राख उनके घरों में रखे खाने तक पहुंच रही है, बच्चों और बुजुर्गों को सांस की तकलीफ हो रही है, आंखों में जलन और त्वचा रोग बढ़ रहे हैं, लेकिन प्रबंधन सिर्फ कागजी छिड़काव दिखा रहा है।
थाना प्रभारी ने मौके पर ही सहायक अभियंता को निर्देश दिए कि तत्काल पानी का छिड़काव कर राख को गीला किया जाए ताकि उड़ान रुके। साथ ही उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ग्रामीणों की उच्च अधिकारियों से बैठक कराकर स्थायी समाधान निकाला जाए। जब अधिकारियों की उपलब्धता के बारे में पूछा गया तो बताया गया कि वरिष्ठ अधिकारी बाहर गए हुए हैं और कल मुलाकात कराई जाएगी।

ग्रामीणों ने पूरे राखड़ डैम का कार्य पूरी तरह बंद कर रखा था। थाना प्रभारी की समझाइश के बाद ग्रामीण केवल पानी छिड़काव के लिए सहमत हुए, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि राख परिवहन और अन्य गतिविधियां तब तक शुरू नहीं होंगी जब तक उनकी समस्याओं का समाधान और उच्च अधिकारियों से सीधी चर्चा नहीं होती।

ग्रामीणों का आरोप है कि टैंकर सिर्फ दिखावे के लिए लगाए जाते हैं। जब आंदोलन या निरीक्षण होता है, तभी पानी डाला जाता है, बाकी समय टैंकर कार्यालय के पास खड़े रहते हैं या लापता रहते हैं।

राख की खुदाई और परिवहन के दौरान कोई ढकाव नहीं किया जाता, जिससे राख हवा में घुलकर नदी तक पहुंच रही है और कोरबा जिले के पेयजल स्रोतों पर खतरा मंडरा रहा है।
यह सवाल अब सिर्फ ग्रामीणों का नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासन, पर्यावरण विभाग और CSEB प्रबंधन की जिम्मेदारी पर सीधा प्रश्नचिह्न है।

यदि राख मानव जीवन के लिए हानिकारक है तो उसे खुले में उड़ने की अनुमति किस कानून के तहत दी जा रही है? और यदि कानून मौजूद हैं, तो“पर्यावरण अधिनियम उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?”
फिलहाल राखड़ डैम में राख परिवहन और अन्य सभी कार्य बंद हैं। केवल पानी छिड़काव की प्रक्रिया शुरू की गई है। ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि जल्द ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकला तो आंदोलन को और व्यापक तथा उग्र रूप दिया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी CSEB प्रबंधन, पर्यावरण विभाग और प्रशासन की होगी।
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