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काग़ज़ों में ऐतिहासिक, ज़मीन पर त्रासदी  धान खरीदी की “सफलता” के नीचे दबता किसान और सहकारी समितियाँ परेशान

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कोरबा | छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

नियम सही, लेकिन क्रियान्वयन लचर, अंतिम तिथि का दबाव, रकबा कटौती, पोर्टल त्रुटियाँ और मानव संसाधन संकट ने खरीदी व्यवस्था को मानसिक तनाव के मोड़ पर ला खड़ा किया

कोरबा: खरीफ विपणन वर्ष 2025–26 के तहत छत्तीसगढ़ में धान खरीदी अपने अंतिम चरण में है। 31 जनवरी की अंतिम तिथि में लगभग 15 दिन शेष हैं। शासन-प्रशासन इसे “सुगम, पारदर्शी और किसानहितैषी” बताता है और आँकड़ों के स्तर पर यह दावा मज़बूत भी दिखता है। 13 जनवरी 2026 तक 17,77,419 किसानों से 105.14 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी और ₹23,448 करोड़ का रिकॉर्ड भुगतान यह 13 जनवरी तक के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि बताई जा रही है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार का दावा है कि समयबद्ध भुगतान, पारदर्शी व्यवस्था और किसानहितैषी नीतियों से किसानों का भरोसा मजबूत हुआ है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिली है। सरकार का संकल्प है हर पात्र किसान से हर दाना खरीदा जाएगा और हर रुपये का भुगतान समय पर होगा।
लेकिन कोरबा जिले की घटना किसानों की बातें ज़मीनी हकीकत इन दावों से उलट तस्वीर पेश करती है।


अंतिम तिथि का दबाव, रकबा कटौती और पोर्टल की उलझन
कोरबा में अंतिम तिथि का दबाव, रकबा कटौती, गिरदावरी की त्रुटियाँ, फोटो-आधारित भौतिक सत्यापन की अनिवार्यता और पोर्टल आधारित जटिलताओं ने किसानों के साथ-साथ पूरी खरीदी व्यवस्था को मानसिक रूप से तोड़ दिया है। कई उपार्जन केंद्रों पर कई किसानों के टोकन अब भी नहीं कट पाए हैं।
शासन के निर्देशानुसार 70 प्रतिशत टोकन ऑनलाइन और 30 प्रतिशत सहकारी समितियों के माध्यम से काटे जा रहा था। प्रति एकड़ 21 क्विंटल की सीमा तय है, वर्तमान में भौतिक सत्यापन के उपरांत टोकन काटा जाना है लेकिन रकबा कटौती और रिकॉर्ड गड़बड़ियों ने इसे व्यावहारिक रूप से अव्यवस्थित बना दिया है।
फोटो-आधारित सत्यापन के बाद समस्या और गहरी हो गई, लेकिन पोर्टल रिकॉर्ड में रकबा शून्य या अन्य फसल दर्ज। सुधार के लिए किसान कलेक्ट्रेड, तहसील, पटवारी और समिति के बीच भटक रहा है। हर बीतता दिन अंतिम तिथि को और नजदीक ला रहा है। किसान के मन में एक ही डर यदि समय पर टोकन नहीं कटा तो फसल काग़ज़ों में ही खत्म।
24 घंटे, दो घटनाएँ—प्रणाली की दरारें उजागर


12 जनवरी 2026 को हरदीबाजार तहसील अंतर्गत ग्राम पूटा निवासी किसान सुमेर सिंह द्वारा आत्महत्या के प्रयास की खबर सामने आई। 3 एकड़ 75 डिसमिल जमीन होने के बावजूद नॉनबिर्रा खरीदी केंद्र में डेढ़ महीने से टोकन नहीं कट पाया। जनदर्शन तक पहुंचने के बाद भी राहत नहीं मिली। लगातार उपेक्षा, आर्थिक चिंता और प्रशासनिक बेरुखी ने एक मेहनतकश अन्नदाता को अस्पताल पहुंचा दिया।
घटना की जानकारी के बाद तत्काल पटवारी का निलंबन, तहसीलदार और फड़ प्रभारी को नोटिस, सहकारी समिति को कारण बताओ कार्रवाई हुई, लेकिन तब जब किसान अस्पताल में था।

घटना रकबा, खसरा और Farmer Information पोर्टल का विरोधाभास

प्राप्त जानकारी के अनुसार किसान के पास लगभग 3 एकड़ 75 डिसमिल भूमि है, इसके बावजूद नॉनबिर्रा धान उपार्जन केंद्र में डेढ़ महीने से उसका टोकन नहीं कट रहा था।

12 जनवरी 2026 को घटना के दिन जब Farmer Information पोर्टल के माध्यम से रिकॉर्ड की जांच की गई, तो फोटो-आधारित भौतिक सत्यापन के आधार पर यह दर्शाया गया कि संबंधित भूमि पर धान फसल की पुष्टि नहीं हो पा रही है। इसी प्रविष्टि के आधार पर प्रारंभिक तौर पर धान विक्रय प्रक्रिया से असंबद्धता का निष्कर्ष निकाला गया।

12 जनवरी को Farmer Information सेक्शन में अद्यतन विवरण इस प्रकार पाया गया किसान सुमेर सिंह ग्राम : पूटा, ग्राम कोड : 00003, तहसील : हरदीबाजार, खसरा विवरण, खसरा नंबर 219/2, रकबा : 1.3150 हेक्टेयर, फसल स्थिति : “डीबीएस द्वारा प्राप्त अन्य फसल” खसरा नंबर 278/2 रकबा : 0.2020 हेक्टेयरफसल : प्रविष्टि नहीं : 1.5170 हेक्टेयर दर्ज था
यही वह पोर्टल है, जिसमें घटना के दिन तक रकबा और फसल को लेकर असंगति दर्ज थी, और अगले दिन वही डेटा “सुधरा हुआ” दिखाई दिया।

हालाँकि, 13 जनवरी घटना के अगले दिन पोर्टल में सुधार दिखाई दिया, जिसमें रिकॉर्ड के अनुसार किसान सुमेर सिंह के नाम पर दो अलग-अलग खसरा नंबर (219/2 एवं 278/2) दर्ज हैं, जिनमें भूमि का प्रकार भुइंया/कृषि भूमि दर्शाया गया है। पहले खसरे में कुल रकबा 1.3150 हेक्टेयर तथा दूसरे खसरे में 0.2020 हेक्टेयर दर्ज है। इस प्रकार किसान के नाम कुल 1.5170 हेक्टेयर कृषि भूमि पोर्टल पर अंकित है।


तालिका में यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि उक्त भूमि से संबंधित धान गिरदावरी/DCS/भौतिक सत्यापन की स्थिति ‘हाँ’ दर्शाई गई है, अर्थात भौतिक सत्यापन के माध्यम से धान प्राप्त होना दर्ज किया गया है। जो व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

आत्महत्या प्रयास का धान खरीदी से कोई संबंध नहीं — जांच रिपोर्ट, प्रशासनिक जांच में भ्रामक खबरों का खंडन
  कुछ समाचार एवं मीडिया माध्यमों में इसे धान विक्रय में कथित परेशानियों से जोड़कर प्रकाशित  मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने तत्काल जांच कराई।
एसडीएम पाली रोहित सिंह ने जांच के निष्कर्ष साझा करते हुए बताया कि सुमेर सिंह के नाम ग्राम पूटा में खसरा नंबर 219/2 रकबा 1.315 हेक्टेयर तथा खसरा नंबर 270/2 रकबा 0.202 हेक्टेयर भूमि दर्ज है। उक्त भूमि का मौके पर निरीक्षण अपर कलेक्टर कोरबा (प्रभारी भू-अभिलेख शाखा), डिप्टी कलेक्टर, तहसीलदार, संबंधित हल्का पटवारी, भूमि विक्रेता जयनारायण गोंड़, ग्राम सरपंच, उप-सरपंच एवं ग्रामवासियों की उपस्थिति में किया गया।


मौका निरीक्षण के दौरान तैयार पंचनामा एवं लिए गए फोटोग्राफ्स के आधार पर यह स्पष्ट रूप से पाया गया कि खरीफ मौसम 2026 में उक्त भूमि पड़ती थी तथा उस पर धान अथवा किसी अन्य फसल की बुवाई नहीं की गई थी।
प्रशासनिक जांच में यह निष्कर्ष सामने आया कि आत्महत्या के प्रयास को धान विक्रय से जोड़कर प्रकाशित समाचार तथ्यात्मक रूप से भ्रामक एवं निराधार हैं। जांच में धान खरीदी से संबंधित किसी भी प्रकार की समस्या का कोई प्रमाण नहीं पाया गया।

सवाल साफ है जब किसान मानसिक रूप से टूट रहा था, तब रिकॉर्ड अधूरा क्यों था, और सुधार घटना के बाद ही क्यों सामने आया?
यहीं सवाल उठते हैं घटना के पूर्व पोर्टल में फसल/रकबा असंगति और अगले दिन उसी पोर्टल में सुधार कैसे? जब किसान टूट रहा था, तब रिकॉर्ड “अधूरा” क्यों था?


प्रशासनिक जांच में बाद में कहा गया कि आत्महत्या प्रयास का धान विक्रय से कोई संबंध नहीं है और मेडिकल रिपोर्ट में जहरखुरानी के बजाय शराब विथड्रॉवल लक्षण बताए गए।

लेकिन ठीक अगले 13 जनवरी को पहली घटना के 24 घंटे के अंदर तहसील परिसर में ही ग्राम झांझ निवासी किसान बैसाखूराम द्वारा कीटनाशक सेवन की दूसरी घटना की खबर सोशल मीडिया के द्वारा  और उपार्जन केंद्र में  किसानों के जरिए सामने आई  जहाँ रकबा कटौती, रिकॉर्ड त्रुटि, सीमित विक्रय, कर्ज का दबाव और दफ्तरों के बीच दौड़ खुलकर दिखी।
प्रशासनिक कदम हेल्पडेस्क, निरीक्षण और सख्ती
घटनाओं के बाद प्रशासन सतर्क हुआ। उपार्जन केंद्रों में हेल्पडेस्क स्थापित किए गए, नोडल अधिकारियों की अनिवार्य उपस्थिति तय हुई, हेल्पलाइन नंबर 9691901259 जारी किया गया। कलेक्टर कुणाल दुदावत के निर्देश पर औचक निरीक्षण शुरू हुए, बिचौलियों पर रोक और पात्र किसानों का शत-प्रतिशत धान खरीदी के निर्देश दिए गए। नमी व गुणवत्ता जांच के लिए धान की पलटी कराकर खरीदी के आदेश हुए और अनियमितता पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई।
ये कदम ज़रूरी हैं, लेकिन सवाल बना हुआ है क्या यह सब पहले नहीं हो सकता था?
किसान ही नहीं, सहकारी समितियाँ भी टूटने की कगार पर
यह संकट केवल किसानों तक सीमित नहीं। सहकारी समितियों के प्रबंधक, फड़ प्रभारी, ऑपरेटर और कर्मचारी भी मानसिक और शारीरिक रूप से भारी दबाव में हैं।
एक तरफ किसानों का दबाव टोकन काटो, बिक्री के लिए आए किसानों की पहचान कर और सत्यापन करना, किसानों के धान की गुणवत्ता की जांच कर खरीदी करना। दूसरी तरफ प्रशासनिक लक्ष्य और नियमों के अनुसार खरीदी करना, ऊपर से मिलरों का उठाव के समय दबाव, वजन-कटौती, और साथ ही समितियों के जरिए दिए गए कर्ज की शत प्रतिशत वसूली करना, कड़ाके की ठंड में मजदूरों की भारी कमी अलग। साथ ही सीमितयो में प्रतिदिन  में हजारों क्विंटल धान की खरीदी, बोरी भरना, वजन, सिलाई, स्टैकिंग और मिलरों को उठाव समय पर ना होने से मौसम का डर, समितियों में धान रखने के लिए जगह की बनाना, प्रतिदिन हजारों क्विंटल सही धान की खरीदी के लिए रात में तैयारी, सब कुछ प्रतिदिन करना, और थोड़ी सी चूक पर कार्यवाही का डर स्वयं में मानसिक और शारीरिक काफी दबाव पूर्ण मेहनत है जो हर किसी के बस की बात भी नही विशेष कर हुए लोगो के लिए संभव नहीं हो पाता, जानकारी के अनुसार आज भी कई समितियों में कर्मचारियों का वेतन महीनों से लंबित है।

मिलर सिस्टम,नुकसान समिति का, जवाबदेही भी उसी की
मिलरो द्वारा धान का समय पर उठाव न करने से समय पर उठाव नहीं होने से धान सूखता है, वजन घटता है भरपाई समिति से। फटी और कमजोर बोरियाँ मिलरों से मिलती हैं, नुकसान फिर समिति का। इसके बाद वही मिलर वजन और उठाव को लेकर दबाव बनाते हैं।
नुकसान भी समिति का, जवाबदेही भी समिति की।

इन सब के बाद धान खरीदी के पूर्व समितियों के कर्मचारियों द्वारा धान खरीदी के पूर्व अपनी समस्याओं और कुछ मांगो को लेकर  हड़ताल हुई,  फिर शासन द्वारा एस्मा का हवाला देकर काम पर लौटाया गया। काम तो शुरू हुआ, लेकिन दबाव खत्म नहीं हुआ। कार्रवाई की तलवार आज भी लटकी है।

नियम सही, ज़मीन पर लापरवाही
धान खरीदी के नियम और मंशा सही हो सकती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर लापरवाही, मानव संसाधन संकट और तकनीकी उलझनों ने व्यवस्था को संवेदनहीन बना दिया है। आँकड़ों की ऐतिहासिक सफलता के बीच कोरबा की घटनाएँ चेतावनी हैं कि अगर क्रियान्वयन में संवेदना, समयबद्ध सुधार और वास्तविक सहायता नहीं आई,, तो कागज़ों की सफलता ज़मीन पर बड़ी पीड़ा में बदल सकती है।

प्रदीप मिश्रा
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