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चांपा सेवा संस्थान का यह चौदहवां वर्ष,वैदिक मंत्रोच्चार से हुआ हसदेव गंगा महाआरती

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चांपा छत्तीसगढ़

By ACGN 7647 9817119303 948009
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

चाम्पा – मकर संक्रान्ति की पूर्व संध्या पर महान तपस्वी एवं साधक तपसी महाराज की पुण्य तपोभूमि डोंगाघाट हनुमान मंदिर परिसर में चांपा सेवा संस्थान द्वारा चौदहवां हसदेव गंगा महाआरती का आयोजन किया गया। हसदेव नदी के तट पर भक्तिमय वातावरण में और असंख्य दीपों की सुसज्जित आभा ने श्रद्धालु भक्तों के मन को असीम शांति प्रदान किया। इस दौरान मानों तो मैं गंगा मां हूं , ना मानों तो बहता पानी जैसे अनेक गीतों की श्रृंखलाबद्ध लय और मधुर ध्वनि सुनकर डोगाघाट हसदेव नदी तट पर लोगों का दिल भर आया। हसदेव नदी के तट पर भक्तिमय वातावरण और दीपों की सुसज्जित आभा ने श्रद्धालु भक्तों के मन को असीम शांति प्रदान किया। चांपा सेवा संस्थान के द्वारा जैसे ही वैदिक मंत्रोच्चार से महाआरती शुरू हुई बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त अपने दोनों हाथ जोड़कर भक्तिभाव से खड़े होकर ध्यान मग्न दिखाई पड़े। हसदेव महाआरती के बाद मंदिर के तट पर श्रद्धालुओं को तिल-लड्डू , रेवड़ी और पेड़ा का प्रसाद वितरण किया गया। साहित्यकार शशिभूषण सोनी ने बताया कि मकर संक्रांति एक महत्वपूर्ण हिंदू त्यौहार माना जाता है , जो कि सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के अवसर पर मनाया जाता हैं। यह पर्व हमें प्रकृति की सुंदरता और महत्व को समझने का अवसर प्रदान करता है और इस दिन हम अपने प्रियजनों के साथ मिलकर अपने संबंध को प्रगाढ़ बनाते हैं। इस अद्वितीय , अलौकिक और अविस्मरणीय अवसर पर चांपा सेवा संस्थान के सदस्यों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुये।

तपसी आश्रम डोगा घाट की प्रसिद्धि

नगर के हदय पर स्थित तपस्वीजी महाराज की तपोभूमि जिसे तपसी आश्रम डोंगाघाट के नाम से जाना जाता है। यह हसदेव सरिता के सुंदर तट पर स्थित पवित्र और प्राचीन मंदिर हैं , जिसमें संगमरमर से बने रामभक्त हनुमान का अपने दोनों कंधों पर भगवान श्रीराम , लक्ष्मण को उठाये तथा अपने पैरों से राक्षस को रौंधते हुये दिव्य मूर्ति विराजमान है। इस मंदिर में संलग्न राम , लक्ष्मण और माता सीता की श्रृंगार युक्त प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के अंदर एक छोटी-सी छतरी की छाया में शिवलिंग स्थापित है , जिसे तपसी महराज की तपस्थली के प्रथम स्थल के रुप में ऐतिहासिक महत्ता है।  तपस्वी महराज के तपोबल में इतनी शक्ति थी कि वे मृत शरीर को भी नवजीवन प्रदान कर देते थे।

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