पानी में डूबा बरहमपुर, व्यवस्था पर उठे सवाल! 2500 करोड़ के पैकेज और विशेष आपदा सहायता की मांग
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बरहमपुर, ओडिशा
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- अनिल कुमार चौधरी, गंजाम
साइक्लोन अर्नब के बाद बाढ़ और तबाही से बेहाल बरहमपुर-गंजाम, शहर तलि मिलित क्रियानुष्ठान कमेटी ने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और केंद्रीय गृह मंत्री को सौंपा विस्तृत ज्ञापन; नालों से अतिक्रमण हटाने, नदियों की गाद निकालने और प्रभावित परिवारों के लिए बढ़े मुआवजे की मांग।
बरहमपुर ACGN:- साइक्लोन अर्नब का असर भले ही थम गया हो, लेकिन इसके बाद बरहमपुर और गंजाम जिले में बाढ़ से हुई तबाही के निशान अब भी लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रहे हैं। शहर के कई हिस्सों और आसपास के ग्रामीण इलाकों में जलभराव, फसल बर्बादी और मकानों को हुए नुकसान ने लोगों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। कहीं खेतों में खड़ी फसलें पानी में डूबकर सड़ रही हैं, तो कहीं मिट्टी के मकान क्षतिग्रस्त होकर जमीन में मिल गए हैं। प्रभावित परिवारों के सामने रहने, खाने और बच्चों की पढ़ाई तक का संकट खड़ा होने की बात कही जा रही है।
इसी स्थिति को लेकर शहर तलि मिलित क्रियानुष्ठान कमेटी ने अब केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित किया है। कमेटी ने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और केंद्रीय गृह मंत्री को विस्तृत ज्ञापन सह विजन डॉक्यूमेंट सौंपकर बरहमपुर और गंजाम के लिए 2500 करोड़ रुपये के विशेष पैकेज तथा विशेष आपदा सहायता की मांग उठाई है। ज्ञापन की प्रतिलिपि राजस्व एवं आपदा प्रबंधन मंत्री, दक्षिणी राजस्व आयुक्त, गंजाम जिला मजिस्ट्रेट और बरहमपुर नगर निगम (BMC) आयुक्त को भी भेजी गई है।

कमेटी का सवाल – यह प्राकृतिक आपदा है या बदहाल व्यवस्था का परिणाम?
कमेटी के अध्यक्ष संजीव कुमार पटनायक ने कहा कि मुख्यमंत्री और राजस्व मंत्री सुरेश पुजारी ने 30 अक्टूबर 2026 को हवाई निरीक्षण कर प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति देखी, जिसके लिए कमेटी ने आभार जताया है। लेकिन उनका कहना है कि हवाई निरीक्षण में हर पीड़ित की वास्तविक पीड़ा दिखाई नहीं देती। जमीन पर हालात कहीं अधिक गंभीर हैं। कमेटी के अनुसार, एक मां अपने बच्चे को नाले के पानी से बचाकर कंधे पर ले जाने को मजबूर है, किसान अपनी बर्बाद फसल देखकर टूट चुके हैं और कई परिवारों के घर तबाह हो गए हैं।
कमेटी ने चिंता जताई है कि फसल बर्बादी और आर्थिक संकट से परेशान कुछ किसान आत्मघाती कदम उठाने तक को मजबूर हो रहे हैं। उसका कहना है कि यह संकट केवल जलभराव तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों की आजीविका, परिवारों के भोजन और बच्चों के भविष्य से जुड़ा हुआ है।

बहना नाला पर अतिक्रमण को बताया जलभराव की बड़ी वजह
कमेटी ने अपने अध्ययन और उपलब्ध पुराने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बहना नाला की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उसका दावा है कि ब्रिटिशकालीन खुदाई के रिकॉर्ड में इस नाले की चौड़ाई लगभग 100 से 120 फीट दर्ज थी, जबकि वर्तमान में अतिक्रमण, राजनीतिक हस्तक्षेप और नगर निकाय के कचरे के कारण कई स्थानों पर इसकी चौड़ाई घटकर महज 10 से 15 फीट रह गई है।
कमेटी का आरोप है कि नाले का प्राकृतिक बहाव बाधित होने से बारिश का पानी तेजी से बाहर नहीं निकल पाता और शहर के कई हिस्सों में जलभराव की स्थिति बन जाती है। कमेटी ने बहना नाला सहित शहर की सभी नालियों और जल निकासी मार्गों को अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग की है।
नदियों के मुहाने पर गाद, समुद्र की ओर पानी का रास्ता भी बाधित!
ज्ञापन में रुशिकुल्या, घोड़ाहाड़, बाहुदा, बड़नदी और बहना नाला के मुहानों पर पिछले कुछ वर्षों से गाद जमा होने की बात कही गई है। कमेटी के मुताबिक, इन जलमार्गों की नियमित सफाई और ड्रेजिंग नहीं होने से पानी की निकासी प्रभावित हो रही है। उसका कहना है कि समुद्र की ओर पानी का प्राकृतिक बहाव बाधित होने पर बाढ़ का पानी वापस आसपास के गांवों और बस्तियों में फैल जाता है।
कमेटी ने नदी क्षेत्रों में कथित अवैध रेत खनन पर भी सवाल उठाए हैं। उसका आरोप है कि अनियंत्रित रेत खनन से नदियों की प्राकृतिक संरचना और तल का संतुलन प्रभावित हुआ है। वर्ष 2019 के बाद वैज्ञानिक तरीके से गाद निकालने का काम नहीं होने का दावा करते हुए कमेटी ने विशेषज्ञों की निगरानी में व्यापक स्तर पर डी-सिल्टिंग कराने की मांग की है।
हालांकि नालों पर अतिक्रमण, गाद जमाव और रेत खनन से बाढ़ की स्थिति पर कितना प्रभाव पड़ा है, इसका वास्तविक आकलन संबंधित विभागों और तकनीकी विशेषज्ञों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
2500 करोड़ का पैकेज और बढ़े हुए मुआवजे की मांग
कमेटी ने केंद्र और राज्य सरकार के सामने प्रभावित क्षेत्र के पुनर्वास और भविष्य में ऐसी आपदाओं से बचाव के लिए व्यापक सहायता की मांग रखी है। इसमें 2500 करोड़ रुपये का विशेष पैकेज, केंद्रीय टीम का तत्काल दौरा, युद्धस्तर पर नालों और नदियों से गाद निकालना तथा जल निकासी व्यवस्था को दुरुस्त करना प्रमुख मांगें हैं।
इसके अलावा किसानों के लिए फसल नुकसान का मुआवजा बढ़ाकर 10 हजार रुपये प्रति एकड़ करने, पूरी तरह क्षतिग्रस्त मकानों के लिए 2 लाख रुपये तक सहायता देने तथा प्रभावित परिवारों को तत्काल 5 हजार रुपये की आर्थिक मदद देने की मांग की गई है। ज्ञापन में मकानों को हुए नुकसान के अनुसार अलग-अलग सहायता राशि, जिसमें कुछ मामलों में 25 हजार रुपये की मदद का भी उल्लेख है, देने की मांग उठाई गई है।
बरहमपुर की आपदा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की कोशिश
कमेटी का कहना है कि बरहमपुर और गंजाम ने 1999 के सुपर साइक्लोन, फैलिन और तितली जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया है। ऐसे में मौजूदा संकट को केवल एक सामान्य मौसमी बाढ़ मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। कमेटी इसे शहरी, तटीय और नदी क्षेत्र से जुड़ी जटिल आपदा बताते हुए राष्ट्रीय स्तर पर विशेष ध्यान देने की मांग कर रही है।
कमेटी ने अपने ज्ञापन में चेतावनी दी है कि यदि आज बहना नाला और दूसरे प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में भी ऐसी आपदाओं का खतरा बना रहेगा। उसका कहना है कि अतिक्रमण हटाकर, नालों और नदियों की वैज्ञानिक सफाई कराकर तथा जल निकासी व्यवस्था को मजबूत बनाकर बरहमपुर को भविष्य की बड़ी आपदाओं से सुरक्षित किया जा सकता है। यह मॉडल तटीय भारत के अन्य शहरों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।
अब केंद्र और राज्य सरकार के फैसले पर निगाहें
बरहमपुर और गंजाम में बाढ़ से प्रभावित लोगों की समस्याओं को लेकर कमेटी ने केंद्र से लेकर जिला प्रशासन तक अपनी मांग पहुंचा दी है। अब सवाल है कि क्या 2500 करोड़ रुपये के विशेष पैकेज और आपदा सहायता पर सरकार कोई ठोस निर्णय लेगी? क्या नालों और नदियों से अतिक्रमण हटाने तथा गाद निकालने की मांग पर समयबद्ध कार्रवाई होगी? और क्या प्रभावित किसानों व परिवारों को उनकी क्षति के अनुरूप पर्याप्त राहत मिल पाएगी?
फिलहाल कमेटी ने ज्ञापन के माध्यम से सरकार के सामने अपनी मांगें रख दी हैं। अब बरहमपुर और गंजाम के प्रभावित लोगों को राहत, पुनर्वास और स्थायी जल निकासी व्यवस्था के लिए ठोस सरकारी पहल का इंतजार है।
प्रदीप मिश्रा [संपादक]
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