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पहाड़ों के नीचे बहता पानी, जंगल में शिवधाम और 45 साल खाकी में रहे धनीराम जी! मोरगा का यह नजारा देखकर लौटने का मन नहीं करेगा

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कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009
प्रदीप मिश्रा संपादक – अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़

जलेश्वर मंदिर में भगवान शिव और मां दुर्गा के दर्शन, पहाड़ों के पत्थरों के नीचे से बहते पानी की मनोहारी छटा और आगे जाकर केंदई जलप्रपात यानी ‘गोल्डन आइसलैंड’ का नजारा। प्रकृति की गोद में अपना जीवन बिता रहे पूर्व नगर निरीक्षक धनिराम राठौर की कहानी भी इस जगह को खास बनाती है। प्रशासन की पहल मिले तो यह क्षेत्र पर्यटन का नया आकर्षण बन सकता है।

कोरबा ACGN:- क्या आपने कभी ऐसी जगह देखी है, जहां घने जंगल के बीच भगवान शिव का मंदिर हो, ऊपर मां दुर्गा विराजमान हों, पहाड़ों के पत्थरों के नीचे से पानी बहता हो और आगे जाकर वही प्राकृतिक जलधारा खूबसूरत जलप्रपात का रूप लेती दिखाई दे? अगर नहीं, तो कोरबा जिले के मोरगा क्षेत्र में स्थित जलेश्वर मंदिर और पास के केंदई जलप्रपात को देखने की योजना जरूर बनाइए। यहां की हरियाली, पहाड़ों की सुंदरता, बहते पानी की आवाज और शांत वातावरण ऐसा अनुभव देते हैं कि कुछ देर बैठने के बाद वहां से उठकर जाने का मन ही नहीं करता। इस खूबसूरत स्थान की कहानी में एक ऐसा व्यक्ति भी है, जिसने पुलिस की खाकी वर्दी में करीब 45 साल सेवा देने के बाद अपना जीवन प्रकृति और भगवान शिव की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।


कोरबा को लोग ऊर्जाधानी के नाम से जानते हैं। यहां बड़े-बड़े बिजली संयंत्र और कोयला खदानें हैं, लेकिन जिले की पहचान सिर्फ उद्योगों तक सीमित नहीं है। यहां घने जंगल, ऊंचे पहाड़, प्राचीन मंदिर, नदियां और जलप्रपात भी हैं, जो पर्यटन की अपार संभावनाएं अपने भीतर समेटे हुए हैं। मोरगा का जलेश्वर मंदिर और केंदई जलप्रपात इसी प्राकृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। बिलासपुर से अंबिकापुर या अंबिकापुर से बिलासपुर की ओर राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरने वाले यात्रियों के लिए यह क्षेत्र एक ऐसा पड़ाव बन सकता है, जहां कुछ समय रुककर प्रकृति और आस्था का अनूठा संगम महसूस किया जा सके।
जंगल के बीच जलेश्वर मंदिर, ऊपर मां दुर्गा का दरबार मन को मिलती है अद्भुत शांति


मोरगा क्षेत्र में स्थित जलेश्वर मंदिर का वातावरण अपने आप में खास है। चारों ओर जंगल, पहाड़ी चट्टानें और हरियाली के बीच भगवान शिव के दर्शन मन को सुकून देते हैं। मंदिर के ऊपरी हिस्से में मां दुर्गा का मंदिर भी है, जहां श्रद्धालु माता के दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं। शहरों के शोरगुल से दूर यहां का शांत वातावरण कुछ समय ठहरकर प्रकृति को महसूस करने का अवसर देता है।


स्थानीय जानकारी के अनुसार, वर्ष 2010 में आचार्य श्री शारदानंद सरस्वती जी महाराज के मार्गदर्शन में यहां शिवलिंग की स्थापना कर मंदिर का निर्माण कराया गया था। आज यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी आकर्षण रखता है। यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान शिव और मां दुर्गा के दर्शन कर सकते हैं, वहीं प्रकृति प्रेमी जंगल और पहाड़ों के बीच फैले शांत वातावरण का आनंद ले सकते हैं।
पहाड़ों के पत्थरों के नीचे से निकलता पानी आगे जाकर बनता है जलप्रपात‘गोल्डन आइसलैड’!


जलेश्वर मंदिर की एक और खासियत यहां का प्राकृतिक जलप्रवाह है। मंदिर के नीचे और आसपास पहाड़ों के पत्थरों के नीचे से पानी बहता दिखाई देता है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, यह जलधारा आगे बढ़ते हुए केंदई जलप्रपात की दिशा में जाती है। केंदई जलप्रपात को ‘गोल्डन आइसलैंड’ के नाम से भी जाना जाता है। इस प्राकृतिक बनावट को देखकर मन में सहज ही सवाल उठता है कि पहाड़ों के नीचे से बहता यह पानी किन रास्तों से आगे बढ़ता है और किस तरह जलप्रपात के रूप में नजर आता है।


इस जलप्रवाह के वास्तविक उद्गम और पूरे रास्ते की वैज्ञानिक पुष्टि अलग विषय है, लेकिन यहां की प्राकृतिक छटा पर्यटकों की जिज्ञासा जरूर बढ़ाती है। एक ओर जंगल के बीच आस्था का केंद्र जलेश्वर मंदिर, दूसरी ओर पहाड़ी पत्थरों के नीचे से बहता पानी और आगे केंदई जलप्रपात का मनोहारी दृश्य- यह पूरा क्षेत्र प्रकृति के प्रेमियों के लिए यादगार अनुभव बन सकता है।
कल्पना कीजिए, आप मंदिर परिसर में खड़े हैं, चारों ओर हरियाली है, पहाड़ों के बीच से पानी बह रहा है और कुछ दूरी पर जलप्रपात की सुंदरता आपका इंतजार कर रही है। ऐसे वातावरण में कुछ पल बिताने के बाद वापस लौटने का मन न करना स्वाभाविक है। यही वह प्राकृतिक आकर्षण है, जिसे कोरबा आने-जाने वाले लोगों को जरूर देखना चाहिए।
45 साल खाकी में सेवा, अब जलेश्वर धाम और प्रकृति के बीच धनीराम राठौर का जीवन


इस जगह की कहानी को और खास बनाते हैं सेवानिवृत्त उप निरीक्षक धनीराम राठौर। उन्होंने करीब 45 साल तक पुलिस विभाग में सेवा दी और रायगढ़ तथा कोरबा जिलों के विभिन्न थानों में अपनी जिम्मेदारियां निभाईं। पुलिस सेवा के दौरान मोरगा क्षेत्र में रहने और काम करने का अवसर मिला। यहां के जंगल, पहाड़ और शांत वातावरण से उन्हें ऐसा लगाव हुआ कि सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका मन इस स्थान से अलग नहीं हो पाया।
जहां आमतौर पर लोग सेवानिवृत्ति के बाद शहरों की सुविधाओं के बीच जीवन बिताना पसंद करते हैं, वहीं धनीराम राठौर ने प्रकृति और आध्यात्मिकता को अपना साथी बना लिया। पत्नी के निधन के बाद वे अपने बेटे के साथ यहां रहने लगे। वर्ष 2022 के आसपास से वे मंदिर परिसर में रहकर उसकी देखभाल और आसपास के क्षेत्र को संवारने में जुटे हैं। वे आचार्य श्री शारदानंद सरस्वती जी महाराज के शिष्य हैं और उनके अनुसार, गुरुजी से उन्हें रचनात्मक कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।
उनका जीवन इस बात की मिसाल है कि किसी जगह से जुड़ाव केवल उसकी सुंदरता देखने तक सीमित नहीं रहता। कभी-कभी कोई स्थान इंसान के जीवन का उद्देश्य ही बन जाता है। धनिराम राठौर के लिए जलेश्वर मंदिर और उसके आसपास का जंगल अब केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि उनकी दिनचर्या, आस्था और सेवा का केंद्र है।
अपनी पेंशन से संवार रहे परिसर, 500 से अधिक पौधे लगाने का दावा


धनिराम राठौर अपने सेवानिवृत्ति के पैसों से मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र को हरा-भरा बनाने का प्रयास कर रहे हैं। उनके अनुसार, यहां बरगद, पीपल, आम और फूलों सहित 500 से अधिक पौधे लगाए गए हैं। उनकी दिनचर्या भी प्रकृति और आध्यात्मिक जीवन से जुड़ी हुई है। वे सुबह करीब तीन बजे उठते हैं, बहते पानी में स्नान करते हैं, भगवान शिव की पूजा करते हैं और अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का स्वागत भी सहज भाव से करते हैं।
उनके आसपास करीब 200 कबूतर और चार बड़े नस्ल के कुत्ते रहते हैं। एक मैना भी उनके करीब रहती थी, जो उनके आसपास मंडराती, उनके साथ भोजन करती और उनके पास ही समय बिताती थी। लेकिन कुछ दिन पहले कुत्ते के काटने से उस मैना की मौत हो गई। पशु-पक्षियों से लगाव रखने वाले धनिराम राठौर के इस छोटे-से संसार का वह प्यारा हिस्सा अब उनके बीच नहीं रहा। यह घटना याद दिलाती है कि प्रकृति के बीच रहने वाले इंसान के लिए जीव-जंतु केवल आसपास रहने वाले प्राणी नहीं, बल्कि उसके जीवन से जुड़े साथी भी बन जाते हैं।
प्रशासन की पहल मिले तो मोरगा की यह सुंदरता पर्यटन के नक्शे पर चमक सकती है
जलेश्वर मंदिर, मां दुर्गा का मंदिर, पहाड़ों के नीचे से बहता पानी और पास का केंदई जलप्रपात ये सभी मिलकर इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से खास बनाते हैं। यदि जिला प्रशासन, पर्यटन विभाग और संबंधित विभाग इस ओर ध्यान दें, तो यहां सुविधाओं का योजनाबद्ध विकास किया जा सकता है। पहुंच मार्ग और दिशा-सूचक बोर्ड, स्वच्छता, बैठने की जगह, पेयजल, व्यवस्थित पार्किंग तथा खतरनाक स्थानों पर सुरक्षा रेलिंग और चेतावनी बोर्ड जैसे इंतजाम पर्यटकों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
धनीराम राठौर जैसे लोग अपने स्तर पर मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र को संवारने में जुटे हैं। यदि उनके प्रयासों को उचित सहयोग मिले और स्थानीय पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए विकास किया जाए, तो यह स्थान धार्मिक पर्यटन और प्रकृति पर्यटन दोनों के लिए आकर्षण बन सकता है। यहां आने वाले लोगों को सुविधा मिले, स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हों और जंगल, पहाड़ तथा प्राकृतिक जलप्रवाह की सुंदरता भी बनी रहे, इसी सोच के साथ विकास की पहल की जानी चाहिए।
कोरबा से गुजरें तो सिर्फ मंजिल नहीं, रास्ते की खूबसूरती भी देखिए
कोरबा जिले में पर्यटन की संभावनाएं केवल केंदई जलप्रपात तक सीमित नहीं हैं। सीतामढ़ी, तुमान, चैतुरगढ़, पाली का प्राचीन शिव मंदिर, कोसगई, देवपहाड़ी, कनकी, सतरेंगा और बांगो जैसे स्थान भी जिले की प्राकृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान को समृद्ध करते हैं। मोरगा का जलेश्वर मंदिर भी इसी धरोहर का हिस्सा है, जिसे अधिक लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है।
इसलिए अगली बार जब आप कोरबा से गुजरें, तो केवल उद्योगों और सड़कों को देखकर आगे न बढ़ जाएं। मोरगा के जलेश्वर मंदिर में भगवान शिव और मां दुर्गा के दर्शन करें। पहाड़ों के पत्थरों के नीचे से बहते पानी और आसपास की हरियाली को करीब से देखें। समय मिले तो केंदई जलप्रपात की सुंदरता का आनंद भी लें। प्राकृतिक स्थलों पर घूमते समय फिसलन वाली चट्टानों, तेज बहाव और गहरे किनारों से दूरी बनाए रखें।
मोरगा की यह कहानी सिर्फ एक मंदिर या जलप्रपात की नहीं, बल्कि प्रकृति, आस्था और धनिराम राठौर जैसे व्यक्ति के समर्पण की कहानी है। यहां की शांति, पहाड़ों के बीच बहता पानी और जंगल की हरियाली लोगों को आकर्षित कर सकती है। यदि प्रशासन इस ओर संवेदनशीलता से पहल करे, तो यह क्षेत्र आने वाले समय में कोरबा की पर्यटन पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
कोरबा को केवल ऊर्जाधानी के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति और पर्यटन की धरती के रूप में भी पहचानिए। शायद मोरगा के जलेश्वर मंदिर और केंदई जलप्रपात की यात्रा के बाद आप भी यही कहेंगे यहां कुछ पल और रुक जाते, तो अच्छा होता!


प्रदीप मिश्रा
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