साइडिंग चल रही या धूल का कारखाना? टेरम की सांसों पर कारीछापर का पहरा, Bag Filter बना शोपीस!
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रायगढ़, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- प्रदीप मिश्रा
24 घंटे उड़ता धूल का गुबार, बच्चों की यूनिफॉर्म से लेकर खेतों की फसल तक पर असर का आरोप; ग्रामीण बोले – पहले धूल रोकिए, फिर कोयला ढोइए
रायगढ़/घरघोड़ा ACGN:- कोयला विकास और रोजगार का रास्ता दिखाता है, लेकिन अगर उसी कोयले की धूल किसी गांव की सांसों में घुलने लगे तो सवाल सिर्फ प्रदूषण का नहीं रहता, सवाल व्यवस्था की जिम्मेदारी का बन जाता है। घरघोड़ा ब्लॉक की ग्राम पंचायत टेरम में कारीछापर कोल साइडिंग को लेकर ग्रामीणों की नाराजगी अब इसी सवाल पर आकर टिक गई है कि आखिर कोयले की आवाजाही जरूरी है या लोगों का साफ हवा में सांस लेना?
सबसे बड़ा सवाल साइडिंग की धूल नियंत्रण व्यवस्था को लेकर है। ग्रामीणों के अनुसार पर्यावरण सुरक्षा के लिए लगाए जाने वाले Bag Filter और Fog Cannon सिस्टम या तो उपलब्ध नहीं हैं अथवा लंबे समय से बंद पड़े हैं। अगर ऐसा है तो फिर सवाल सीधा है – धूल रोकने के लिए लगाए गए उपकरण आखिर किस काम के हैं? क्या वे सिर्फ निरीक्षण के समय दिखाने के लिए हैं या वास्तव में चौबीसों घंटे चलने वाली व्यवस्था का हिस्सा हैं?
ग्रामीणों का आरोप है कि कारीछापर कोल साइडिंग से उड़ने वाली धूल ने कई महीनों से गांव का जीना मुश्किल कर दिया है। साइडिंग गेट से लेकर घरघोड़ा-धर्मजयगढ़ मुख्य मार्ग तक धूल का ऐसा गुबार उठता है कि राहगीरों और दोपहिया वाहन चालकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि सुबह स्कूल जाने वाले बच्चों की यूनिफॉर्म तक धूल से भर जाती है और सड़क पर कई बार सामने का रास्ता साफ दिखाई नहीं देता। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर सड़क पर धूल इतनी है कि वाहन चालक को आगे का रास्ता साफ दिखाई न दे, तो दुर्घटना होने के बाद जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
मामले में SECL के अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार कारीछापर में पहले SECL की कोल साइडिंग थी, लेकिन पिछले करीब दो वर्षों से यहां NTPC का कोयला आ रहा है। बताया गया है कि तीलाईपाली से NTPC का कोयला कारीछापर साइडिंग तक पहुंच रहा है।
यहीं से ग्रामीणों का सवाल और भी बड़ा हो जाता है।
कोयला NTPC का हो, साइडिंग का पुराना संबंध SECL से रहा हो और काम ठेकेदार के माध्यम से हो रहा हो, लेकिन धूल की मार आखिर कारीछापर के ग्रामीण क्यों झेलें?
स्वास्थ्य को लेकर भी ग्रामीणों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि बच्चों और बुजुर्गों में लगातार खांसी तथा सांस लेने में परेशानी जैसी शिकायतें बढ़ रही हैं। आंखों में जलन और त्वचा संबंधी परेशानी की शिकायतें भी सामने आने की बात कही जा रही है। हालांकि इन स्वास्थ्य प्रभावों की वास्तविक स्थिति और किसी विशेष बीमारी का कारण निर्धारित करने के लिए चिकित्सकीय एवं पर्यावरणीय जांच जरूरी होगी, लेकिन ग्रामीणों की शिकायतों को केवल धूल-मिट्टी की सामान्य परेशानी मानकर नजरअंदाज करना भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब पंचायत स्तर पर इस मामले को लिखित रूप से उठाने की तैयारी है। ग्राम पंचायत की ओर से कलेक्टर रायगढ़, छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल, अनुविभागीय अधिकारी घरघोड़ा को आवेदन देने की बात कही गई है।
ग्रामीणों की मांग है कि जब तक Dust Suppression System प्रभावी रूप से चालू नहीं किया जाता, तब तक साइडिंग में लोडिंग और अनलोडिंग पर रोक लगाई जाए। इसके साथ ही दिन में कम से कम चार बार पानी का छिड़काव कराने की मांग भी की गई है, ताकि सड़क और आसपास के क्षेत्र में धूल का उड़ना कम हो सके।
अब असली सवाल प्रशासन के सामने है। क्या संबंधित विभाग मौके पर जाकर यह जांच करेगा कि Bag Filter और Fog Cannon वास्तव में काम कर रहे हैं या केवल कागजों में व्यवस्था पूरी है? क्या साइडिंग से निकलने वाली धूल का वैज्ञानिक परीक्षण कराया जाएगा? क्या आसपास रहने वाले ग्रामीणों की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर स्वास्थ्य विभाग जांच करेगा? और क्या पर्यावरणीय मानकों के पालन की मौके पर जांच होगी?
क्योंकि विकास के नाम पर उद्योग और खनिज गतिविधियां चलना अपनी जगह है, लेकिन विकास की कीमत किसी गांव की सांसें नहीं हो सकतीं। अगर धूल रोकने की व्यवस्था कागज पर दुरुस्त है तो जमीन पर भी उसका असर दिखाई देना चाहिए। और अगर व्यवस्था बंद है तो उसे चालू कराने की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन और चक्का जाम का रास्ता अपना सकते हैं। ऐसी स्थिति आने से पहले प्रशासन और संबंधित कंपनी प्रबंधन को मौके पर पहुंचकर ग्रामीणों की शिकायतों की जांच करनी चाहिए। आखिर सड़क पर उड़ती धूल को देखकर भी अगर व्यवस्था की आंखें बंद रहेंगी, तो फिर सवाल सिर्फ कारीछापर साइडिंग का नहीं, पूरी निगरानी व्यवस्था का होगा।
अब देखना यह है कि NTPC, SECL, संबंधित ठेकेदार और प्रशासन ग्रामीणों की इस परेशानी को कितनी गंभीरता से लेते हैं। सवाल किसी कंपनी के खिलाफ खड़ा होने का नहीं, बल्कि कारीछापर के लोगों को उनका साफ वातावरण और राहत दिलाने का है।
कारीछापर के ग्रामीणों का प्रशासन से साफ कहना है, कोयला किसका है, ठेका किसका है, जिम्मेदारी किसकी है, यह आप तय कीजिए; लेकिन हमें इस धूल से निजात दिलाइए।
SECL – NTPC और संबंधित अधिकारियों का पक्ष इस खबर में उपलब्ध नहीं है। शिकायतों की स्वतंत्र जांच तथा संबंधित प्रबंधन और प्रशासन का पक्ष सामने आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी।
प्रदीप मिश्रा
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