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“पहले अनुमति या पहले पाइपलाइन? लोतलोता राखड़ बांध पर ग्रामीणों का सवाल, सीएसईबी से जवाब की मांग”

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कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009


प्रभावित ग्रामीणों ने पूर्व राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल को सौंपा ज्ञापन, बांध की सुरक्षा और पुनः राखड़ भंडारण की तैयारी पर जताई चिंता; अग्रवाल ने तत्काल अधिकारियों से चर्चा कर कलेक्टर को लिखा पत्र

कोरबा ACGN:- कोरबा के लोतलोता गांव में राखड़ बांध को लेकर एक बार फिर वही सवाल सिर उठाने लगा है, जिसे शायद ग्रामीण कभी दोबारा सुनना नहीं चाहते, अगर राखड़ बांध फिर शुरू हुआ तो क्या इस बार गांव सुरक्षित रहेगा?
लोतलोता के प्रभावित ग्रामीणों ने पूर्व राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल से मुलाकात कर उन्हें ज्ञापन सौंपा और राखड़ बांध से जुड़ी अपनी समस्याओं, आशंकाओं और पुराने अनुभवों की जानकारी दी। ग्रामीणों का कहना था कि बांध की स्थिति को लेकर पहले भी चिंता रही है और अब वहां दोबारा राखड़ भंडारण की तैयारी तथा पाइपलाइन बिछाने की गतिविधियों की जानकारी ने उनकी चिंता बढ़ा दी है।
ग्रामीणों की बात सुनने के बाद जयसिंह अग्रवाल ने मामले को तत्काल गंभीरता से लिया। उन्होंने कोरबा के अपर कलेक्टर और छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी के मुख्य अभियंता से मोबाइल पर चर्चा कर लोतलोता राखड़ बांध की वर्तमान स्थिति और वहां चल रही गतिविधियों के बारे में जानकारी ली। इसके बाद उन्होंने कलेक्टर को पत्र लिखकर पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप और आवश्यक जानकारी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने की मांग की।


            सवाल सिर्फ पाइपलाइन का नहीं, सुरक्षा का है
लोतलोता के ग्रामीणों की चिंता को यदि केवल किसी विकास कार्य के विरोध के रूप में देखा गया, तो शायद इस पूरे मामले की असली तस्वीर सामने नहीं आएगी। सवाल यह है कि राखड़ बांध के आसपास रहने वाले ग्रामीणों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है? क्या बांध की वर्तमान संरचनात्मक स्थिति की स्वतंत्र जांच हुई है? क्या तटबंध मजबूत है? क्या ढलान सुरक्षित है? क्या जल निकासी की व्यवस्था पर्याप्त है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या सभी आवश्यक पर्यावरणीय और तकनीकी अनुमतियां पूरी हो चुकी हैं?
ग्रामीणों के अनुसार, बांध के आसपास गांव, कृषि भूमि और विद्यालय हैं। ऐसे में राखड़ भंडारण से जुड़ी किसी भी गतिविधि का प्रभाव केवल बिजली कंपनी की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहेगा। अगर राखड़ या पानी बांध की सीमा से बाहर निकलता है तो उसका सीधा असर खेतों, फसलों, रास्तों और ग्रामीण आबादी पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि ग्रामीण चाहते हैं कि उन्हें केवल यह कहकर शांत न किया जाए कि सब कुछ नियमों के अनुसार होगा। वे जानना चाहते हैं कि नियम क्या हैं, जांच किसने की है, अनुमति किसने दी है और सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी होगी?
           23 जून की सशर्त अनुमति ने बढ़ाया सवाल
जयसिंह अग्रवाल ने अपने पत्र में छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा 23 जून 2026 को लोतलोता राखड़ बांध के तालाब-ए के 22 हेक्टेयर क्षेत्र के अस्थायी उपयोग के लिए दी गई सशर्त अनुमति का उल्लेख किया है।


उनके अनुसार इस अनुमति की तीसरी शर्त में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति को अनिवार्य बताया गया है। उनका कहना है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति प्राप्त नहीं होने की स्थिति में पर्यावरण संरक्षण मंडल की अस्थायी अनुमति स्वतः निरस्त मानी जाएगी।
यहीं से वह सवाल खड़ा होता है जिसे अब प्रशासन और सीएसईबी को स्पष्ट करना चाहिए।
यदि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति अनिवार्य है, तो क्या वह सहमति प्राप्त हो चुकी है?
यदि हां, तो उसकी प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?
और यदि सहमति अभी प्राप्त नहीं हुई है, तो फिर लोतलोता राखड़ बांध तक पाइपलाइन बिछाने अथवा राखड़ भंडारण से संबंधित तैयारी किस अनुमति के आधार पर की जा रही है?
यह सवाल जयसिंह अग्रवाल ने भी उठाया है और उन्होंने कलेक्टर से इस स्थिति को तत्काल स्पष्ट कराने की मांग की है।
सीएसईबी के सामने सबसे बड़ा सवाल – पहले काम या पहले अनुमति?
यहीं पर सीएसईबी से कुछ सीधे सवाल पूछे जाने जरूरी हैं।
यदि राखड़ बांध को दोबारा उपयोग में लाने की तैयारी है तो क्या उससे पहले बांध की संपूर्ण सुरक्षा जांच कराई गई है? क्या तटबंध की मजबूती का परीक्षण हुआ है? क्या जल निकासी व्यवस्था की क्षमता जांची गई है? क्या पाइपलाइन बिछाने से पहले सभी आवश्यक पर्यावरणीय अनुमतियां प्राप्त की गई हैं? क्या केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति उपलब्ध है? और क्या इन सभी दस्तावेजों की जानकारी प्रभावित ग्रामीणों को दी गई है?
क्योंकि मामला किसी खाली मैदान में पाइपलाइन बिछाने का नहीं है। यह उस जगह की बात है जहां राखड़ का भंडारण होना है और जहां आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा सीधे जुड़ी हुई है।
सीएसईबी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पहले अनुमति मिलेगी और फिर काम होगा, या पहले काम दिखाई देगा और बाद में कागज सामने आएंगे? यही वह सवाल है जिसका जवाब ग्रामीण भी चाहते हैं और अब प्रशासन से भी अपेक्षा की जा रही है।
          पुराने अनुभवों ने डर को और गहरा किया
लोतलोता के ग्रामीणों की आशंका अचानक पैदा नहीं हुई है। ग्रामीणों ने पूर्व में राखड़ और पानी के फैलाव से जुड़ी घटनाओं का हवाला देते हुए अपनी चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार ऐसी घटनाओं के बाद बांध की सुरक्षा को लेकर उनका विश्वास पहले ही प्रभावित हुआ है।
ऐसे में अगर उसी क्षेत्र में दोबारा राखड़ भंडारण की तैयारी होती है तो ग्रामीणों का सवाल स्वाभाविक है, क्या पुरानी कमियों को दूर कर दिया गया है या सिर्फ राखड़ रखने की जगह फिर तैयार की जा रही है?
जयसिंह अग्रवाल ने अप्रैल 2026 में झाबू राखड़ बांध से जुड़ी दुर्घटना का उल्लेख करते हुए भी कहा है कि ऐसी घटनाओं के बाद राखड़ बांधों की सुरक्षा को लेकर उठने वाली ग्रामीणों की आशंकाओं को गंभीरता से लेना जरूरी है।
         ग्रामीणों का ज्ञापन अब कलेक्टर की मेज पर
लोतलोता के ग्रामीणों ने पूर्व राजस्व मंत्री को ज्ञापन देकर अपनी समस्याएं रखीं। जयसिंह अग्रवाल ने ग्रामीणों की बात सुनने के बाद तत्काल अधिकारियों से चर्चा की और फिर कलेक्टर को पत्र भेजा।
उन्होंने मांग की है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति की स्थिति तत्काल स्पष्ट कराई जाए। जब तक आवश्यक पर्यावरणीय अनुमति, तकनीकी परीक्षण और सुरक्षा संबंधी जांच पूरी न हो जाए, तब तक पाइपलाइन बिछाने अथवा राखड़ भंडारण से जुड़ी गतिविधियों को आगे नहीं बढ़ाया जाए।


इसके साथ ही उन्होंने लोतलोता राखड़ बांध की संरचनात्मक मजबूती, तटबंध, ढलान की स्थिरता, जल निकासी व्यवस्था और अन्य सुरक्षा मानकों की स्वतंत्र विशेषज्ञ संस्था से जांच कराने की मांग की है। यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस संस्था से जुड़े राखड़ बांध का उपयोग किया जाना है, उसकी अपनी आंतरिक जांच के बजाय स्वतंत्र विशेषज्ञों की जांच से ग्रामीणों का भरोसा अधिक मजबूत हो सकता है।
        किसानों की जमीन और गांव की सुरक्षा का क्या?
राखड़ भंडारण का मामला केवल बिजली उत्पादन से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। बिजली जरूरी है, उद्योग जरूरी हैं, विकास जरूरी है, लेकिन जिस विकास की कीमत किसी किसान की फसल, किसी ग्रामीण की जमीन या किसी बच्चे की सुरक्षा से चुकानी पड़े, वहां सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है।
लोतलोता में ग्रामीणों की चिंता यही है कि यदि भविष्य में राखड़ बांध से कोई समस्या पैदा होती है तो उसका भार किसके ऊपर आएगा? किसान की फसल खराब होने पर कौन जिम्मेदार होगा? पानी या राखड़ खेतों में पहुंचने पर नुकसान की भरपाई कौन करेगा? गांव के रास्ते प्रभावित हुए तो जिम्मेदारी किसकी होगी? और यदि बांध की संरचना कमजोर पाई गई तो उसके सुधार की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? इन सवालों का जवाब हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले दिया जाना चाहिए।
                 सीएसईबी से जवाब मांगता लोतलोता
लोतलोता के मामले में अब गेंद प्रशासन और सीएसईबी के पाले में है। ग्रामीणों ने अपनी बात रख दी है। ज्ञापन सौंप दिया गया है। पूर्व मंत्री ने अधिकारियों से चर्चा कर दी है। कलेक्टर को पत्र भी भेज दिया गया है।
अब आवश्यकता केवल आश्वासन की नहीं, बल्कि दस्तावेजी जवाब और स्वतंत्र सुरक्षा जांच की है।
सीएसईबी यदि यह कहता है कि सभी नियमों और अनुमतियों का पालन किया जा रहा है तो उसे यह स्पष्ट करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति प्राप्त है या नहीं, पर्यावरणीय अनुमति की कौन-कौन सी शर्तें लागू हैं, बांध की सुरक्षा जांच कब और किस संस्था ने की, पाइपलाइन बिछाने की अनुमति किस आधार पर मिली और राखड़ भंडारण शुरू करने से पहले कौन-कौन से सुरक्षा उपाय किए जा रहे हैं।


क्योंकि ग्रामीणों के लिए यह कोई कागजी प्रक्रिया नहीं है। उनके लिए यह उनके घर, खेत, बच्चों और भविष्य की सुरक्षा का सवाल है।
अब देखना है, जवाब कागज पर आएगा या फिर गांव को इंतजार करना पड़ेगा?
लोतलोता की कहानी में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रामीणों ने अपनी चिंता दबाने के बजाय उसे ज्ञापन के माध्यम से सामने रखा। पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने उस शिकायत को लेकर अधिकारियों से चर्चा की और कलेक्टर को पत्र भेजा।
अब प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर ग्रामीणों को वास्तविक स्थिति बताए।
और सीएसईबी के सामने चुनौती यह है कि वह साफ-साफ बताए, लोतलोता राखड़ बांध को दोबारा उपयोग में लाने से पहले सभी सुरक्षा और पर्यावरणीय शर्तें पूरी हुई हैं या नहीं।
क्योंकि राखड़ को बांध में रोकना आसान हो सकता है, लेकिन अगर राखड़ बांध की सीमा तोड़कर गांव की ओर बढ़ा तो उसे रोकना इतना आसान नहीं होगा।
लोतलोता के ग्रामीणों का सवाल इसलिए केवल आज का सवाल नहीं है। यह आने वाले कल की सुरक्षा का सवाल है।


प्रदीप मिश्रा
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